विश्वब्रत गोस्वामी सेकोलकाता , जून 01 -- एक मामूली अंडा, जो स्कूली बच्चों के लिए प्रोटीन का सस्ता जरिया, सरकारी पोषण कार्यक्रमों की जीवनरेखा और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का मुख्य आधार हुआ करता था, आज पूरी तरह से एक अलग राजनीतिक पहचान हासिल कर चुका है।

चुनावी रैलियों और मंत्रियों के काफिलों से लेकर जनसभाओं और चुनाव अभियानों तक, अंडे तेजी से राजनीतिक विरोध का जरिया बनते जा रहे हैं। इन्हें किसी को चोट पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि अपमानित करने, शर्मिंदा करने और लोगों का ध्यान खींचने के लिए फेंका जाता है।

यह घटना समकालीन भारत के बारे में एक गहरी सच्चाई बयां करती है। ऐसे समय में जब देश के करोड़ों बच्चे कुपोषण और प्रोटीन की कमी से जूझ रहे हैं, देश का सबसे किफायती पोषण संबंधी संसाधन अब प्रतीकात्मक विरोध का हथियार बन गया है।

हालिया घटनाएं एक लंबी और अजीब राजनीतिक परंपरा का हिस्सा हैं। सार्वजनिक हस्तियों पर अंडे फेंकने का चलन सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है। तमाम लोकतांत्रिक देशों में अंडे फेंकना लंबे समय से विरोध का एक कम लागत वाला और आसानी से दिखने वाला माध्यम रहा है। लेकिन भारत में जहां आंदोलन की राजनीति तेजी से सार्वजनिक विमर्श पर हावी हो रही है, यह कृत्य राजनीतिक संदेश देने के एक असरदार औजार के रूप में विकसित हो गया है।

विडंबना यह है कि राजनीति में अंडे का यह सफर बिल्कुल अलग जगह से शुरू हुआ था। आजादी के बाद के दशकों में, नीति निर्माताओं के सामने गरीबी और गंभीर कुपोषण की दोहरी चुनौतियां थीं। प्रोटीन, विटामिन और जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण, अंडे को किफायती पूरक आहार के रूप में व्यापक रूप से बढ़ावा दिया गया। स्कूली भोजन कार्यक्रमों, विशेष रूप से मध्याह्न भोजन योजना में इन्हें शामिल करना, बच्चों के पोषण और उनकी शिक्षा के स्तर में सुधार करने का एक व्यावहारिक कदम माना गया था।

तमिलनाडु ने स्कूली भोजन में अंडे की शुरुआत करने की पहल की थी, जिसे बाद में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने भी अपनाया। पोषण विशेषज्ञों का हमेशा से यह तर्क रहा है कि बहुत कम खाद्य पदार्थ इतनी कम कीमत पर इसके बराबर पोषण मूल्य देते हैं।

विरोध के लिए अंडे फेंकने का चलन यूं तो काफी पहले से है, लेकिन हालिया दो-तीन दशकों में इसने काफी जोर पकड़ लिया है। इस दौरान करीब-करीब हर पार्टी के नेता इसके शिकार हुए हैं।

राजनीतिक नेताओं पर बार-बार हुए हमलों ने उस स्थिति को जन्म दिया जिसे स्थानीय विश्लेषकों ने 'एग वॉर्स' का नाम दिया।

यह सिलसिला हाल के वर्षों में भी जोर पर है। वर्ष 2022 में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को अंडे के हमले के सामना करना पड़ा, जबकि इसी साल गोवा में एक चुनाव अभियान के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सामना भी अंडा फेंकने वाले प्रदर्शनकारियों से हुआ।

पश्चिम बंगाल में, प्रतीकात्मक चीजों को फेंकने वाले राजनीतिक टकरावों में तमाम पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाया गया है, जिनमें तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी इसके सबसे ताजा शिकार हैं।

एक राजनीतिक हथियार के रूप में अंडे का आकर्षण इसके प्रतीकात्मक होने में छिपा है। यह सस्ता है, आसानी से मिल जाता है और इससे जान का कोई खतरा नहीं होता। इसके बावजूद, यह ठीक वैसी ही नाटकीय तस्वीरें और वीडियो पैदा करता है जिसे आज का मीडिया तंत्र हाथों-हाथ लेता है। टेलीविजन कैमरों, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया फीड के इस दौर में, किसी राजनेता की तरफ उड़ता हुआ एक अकेला अंडा भी अक्सर शासन, नीति या जन कल्याण पर होने वाली लंबी बहसों से कहीं ज्यादा ध्यान खींच लेता है।

यह विरोधाभास भारत की 'अंडा राजनीति' का सबसे बड़ा सच सामने लाता है। एक तरफ जहां राजनेता चुनाव अभियानों में अंडों से बचते फिर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत गंभीर पोषण संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है। कई क्षेत्रों में बाल कुपोषण, बच्चों का सही विकास न होना और प्रोटीन की कमी आज भी चिंताजनक विषय बने हुए हैं। अंडों के पोषण संबंधी फायदों को लेकर व्यापक वैज्ञानिक सहमति होने के बावजूद, इस बात पर बहस जारी है कि इन्हें कल्याणकारी योजनाओं में शामिल किया जाना चाहिए या नहीं।

इस अंतर्विरोध को नजरअंदाज करना मुश्किल है। एक खाद्य पदार्थ जो करोड़ों बच्चों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की क्षमता रखता है, उसी का इस्तेमाल राजनीतिक तमाशे के एक औजार के रूप में किया जा रहा है।

बारासात विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के व्याख्याता (लेक्चरर) डॉ. अमिताभ सेनगुप्ता ने कहा, "भारत की अंडा राजनीति एक गहरे विरोधाभास को उजागर करती है। हम एक ऐसे देश हैं, जहां आज भी करोड़ों बच्चों को पोषण के लिए अंडे की ज़रूरत है। फिर भी उसी अंडे का इस्तेमाल राजनीतिक गुस्से को जाहिर करने के लिए तेजी से किया जा रहा है। पोषण से तमाशे की तरफ का यह बदलाव यह दिखाता है कि कैसे हमारा सार्वजनिक विमर्श अक्सर विकास के मुद्दों के बजाय प्रतीकात्मक टकराव को तरजीह देता है।"इसलिए, भारत में बार-बार होने वाले ये 'एग वार्स' लोकतांत्रिक राजनीति के बदलते स्वरूप की एक बड़ी कहानी बयान करते हैं। ये उस दौर को दर्शाते हैं, जिसमें ठोस मुद्दों पर अक्सर प्रतीकवाद हावी हो जाता है, नीतियों की चर्चा पर प्रदर्शनकारी टकराव ग्रहण लगा देता है, और जनता का ध्यान समाधानों के बजाय तमाशे की तरफ ज्यादा खिंचा चला जाता है।

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