देवरिया , मार्च 02 -- उत्तर प्रदेश के देवरिया में प्रेम और सौहार्द का प्रतीक होली पर्व बदलती सामाजिक प्रवृत्तियों के बीच अपनी पारंपरिक मिठास खोता नजर आ रहा है। जानकारों का मानना है कि शराब पीने और पिलाने की बढ़ती संस्कृति ने इस त्योहार की आत्मीयता पर गहरा असर डाला है।वरिष्ठ नागरिकों के अनुसार पहले गांवों में बसंत पंचमी से ही ढोलक, नगाड़े और झाल की थाप पर विशिष्ट शैली में फगुआ गाया जाता था। बुजुर्गों से लेकर युवा तक सामूहिक रूप से राग-फाग गाते थे और होली आपसी प्रेम का उत्सव बन जाती थी। किंतु आधुनिक दौर में यह परंपरा लगभग समाप्ति की ओर है।

आज ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में होली के दौरान शराब के बढ़ते चलन ने त्योहार के स्वरूप को बदल दिया है। स्थिति यह है कि शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन को प्रत्येक थाने पर पीस कमेटी की बैठकें करनी पड़ रही हैं और पुलिस बल की विशेष तैनाती करनी पड़ती है। अस्पतालों को भी एलर्ट मोड पर रखा जाता है। इसे होली पर नशे की बढ़ती प्रवृत्ति का परिणाम माना जा रहा है।

इतिहासकार डॉ. दिवाकर तिवारी के अनुसार करीब चालीस वर्ष पूर्व होली में राग और फागों का विशेष महत्व होता था, लेकिन आज शराब के बढ़ते प्रचलन के कारण वे परंपराएं कहीं खो गई हैं। युवाओं को पारंपरिक होली गीतों के बजाय नशे में फिल्मी गीतों पर झूमते देखा जा सकता है।

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