अमृतसर , अगस्त 20 -- पंजाब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रवक्ता और सिख चिंतक प्रो. सरचंद सिंह ख्याला ने गुरुवार को कहा कि वह बंदी सिंहों की समय से पहले रिहाई के पक्ष में हैं, लेकिन यह मुद्दा राजनीतिक दबाव के बजाय मानवीय संवेदना और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर हल किया जाना चाहिए।
प्रो. ख्याला ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2019 में बंदी सिंहों के संबंध में अधिसूचना जारी कर संबंधित राज्यों को संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश देना इस दिशा में केंद्र सरकार की गंभीर पहल का प्रमाण है। उन्होंने दावा किया कि इसके तहत छह बंदी सिंहों की समय से पहले रिहाई हो चुकी है, जबकि दो अन्य मामलों पर संबंधित राज्य सरकारों के स्तर पर विचार चल रहा है। बलवंत सिंह राजोआणा के मामले में भी उच्चतम न्यायालय का अंतिम फैसला अभी नहीं आया है। उन्होंने कहा कि दशकों से जेलों में बंद बंदी सिंहों के मामलों को केवल अपराध की कानूनी परिभाषा तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। पंजाब में पिछले दशकों के दौरान पैदा हुए राजनीतिक संघर्ष और प्रतिकूल परिस्थितियों का भी इस पूरे मुद्दे से संबंध रहा है। इसलिए कानून के अनुसार प्रक्रिया जारी रखते हुए मानवीय पहलू पर भी संवेदनशीलता से विचार किया जाना चाहिए।
कौमी इंसाफ मोर्चा द्वारा 21 अगस्त को बंदी सिंहों की रिहाई के लिये दिये गये पंजाब बंद के आह्वान पर प्रो. ख्याला ने कहा कि अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से उठाना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन किसी भी आंदोलन का स्वरूप ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे आम लोगों की रोजी-रोटी, कारोबार या सामाजिक शांति प्रभावित हो। उन्होंने दिल्ली की मंडोली जेल से जगतार सिंह हवारा द्वारा युवाओं से संयम बरतने, कानून को अपने हाथ में न लेने, हिंसा से दूर रहने और शरारती तत्वों से सावधान रहने की अपील का स्वागत किया।
उन्होंने कहा कि पंजाब पहले ही हिंसा की भारी कीमत चुका चुका है और किसी भी कीमत पर दोबारा हिंसक माहौल पैदा नहीं होने देना चाहिए।
प्रो ख्याला ने कहा कि 'बंदी सिंह' की परिभाषा और संख्या को लेकर अलग-अलग संगठनों के अपने दावे हैं, लेकिन लोकतंत्र में किसी भी व्यक्ति के मामले का निर्धारण संविधान और कानून के अनुसार ही होना चाहिए। उन्होंने कहा कि रिहाई का फैसला सड़कों के दबाव या राजनीतिक नारों के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित कानूनी नीतियों, सजा की अवधि, जेल में व्यवहार और अन्य संबंधित मानदंडों के आधार पर होना चाहिए।
मोर्चों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए प्रो. ख्याला ने कहा कि बंदी सिंह गुरदीप सिंह खेड़ा सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि उनकी रिहाई में इन मोर्चों की कोई भूमिका नहीं रही। उन्होंने 21 जनवरी 2024 को मोहाली-चंडीगढ़ सीमा पर चल रहे कौमी इंसाफ मोर्चे में शामिल होने पहुंचे एसजीपीसी अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी की गाड़ी पर हुए हमले और तोड़फोड़ का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि किसी सिख संस्था के प्रमुख की सुरक्षा और मर्यादा का भी ध्यान नहीं रखा जाता, तो ऐसे आंदोलनों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रो ख्याला ने कहा कि बंदी सिंहों का मुद्दा मानवाधिकार और कानूनी न्याय से जुड़ा है तथा इसे चुनावी राजनीति का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए। हर कैदी को संविधान और कानून के अनुसार न्याय मिलना चाहिए और जिन मामलों में समय से पहले रिहाई कानूनी रूप से उचित बनती है, वहां संबंधित प्राधिकरण को निष्पक्षता से निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि सिख भावनाओं को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना न तो पंजाब के हित में है और न ही इससे बंदी सिंहों की समस्या का स्थायी समाधान निकलेगा। यदि मोर्चा इस मुद्दे को लेकर वास्तव में गंभीर है तो उसे संवैधानिक और कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पंजाब को नशे, बेरोजगारी, उद्योग, निवेश और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर भी उतनी ही गंभीरता से संघर्ष करने की जरूरत है। हर बार धार्मिक भावनाओं को चुनावी हथियार बनाना पंजाब की भावनाओं के साथ न्याय नहीं है। उन्होंने कहा कि बंदी सिंहों की बात करते समय बेअंत सिंह हत्याकांड में मारे गए 16 अन्य लोगों और उनके परिवारों के दर्द को भी नहीं भूलना चाहिए। उनके अनुसार न्याय का अर्थ हर पीड़ित के दर्द को समान संवेदनशीलता के साथ समझना भी है।
जगतार सिंह हवारा की पैरोल के मुद्दे पर प्रो. ख्याला ने कहा कि यह मामला केवल कानूनी या तकनीकी नहीं, बल्कि मानवीय पहलू से भी जुड़ा है। यदि कानून इसकी अनुमति देता है और सभी सुरक्षा मानदंड पूरे होते हैं तो एक बुजुर्ग मां की अपने पुत्र से मिलने की इच्छा पर संवेदनशीलता से विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हवारा की पैरोल प्रक्रिया दिल्ली में भाजपा सरकार बनने के बाद शुरू होने का दावा सही नहीं है। उनके अनुसार 11 जून 2025 को उच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद इस मामले में प्रक्रिया शुरू हुई थी। दिल्ली सरकार के डायरेक्टर जनरल (प्रिजन्स) कार्यालय ने 21 अक्टूबर 2025 को पंजाब सरकार से हवारा को पैरोल देने के संबंध में रिपोर्ट मांगी थी। पंजाब सरकार ने 19 फरवरी 2026 को जवाब देते हुए हवारा के खिलाफ दर्ज 25 आपराधिक मामलों का हवाला देकर पैरोल नहीं देने की सिफारिश की थी।
उन्होंने कहा कि इसके बाद 11 जुलाई 2026 को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने मंडोली जेल प्राधिकरण को हवारा की पैरोल याचिका पर कानून के अनुसार विचार करने के निर्देश दिये।
प्रो. ख्याला ने स्पष्ट किया कि पैरोल देने का अंतिम फैसला अदालत नहीं, बल्कि लागू जेल नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार संबंधित जेल प्राधिकरण द्वारा किया जाता है। उन्होंने कहा कि 8 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा पंजाब के राज्यपाल को पत्र लिखकर और उनसे मुलाकात कर हवारा को पैरोल देने की सिफारिश करना राजनीतिक अवसरवाद से अधिक कुछ नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि कुछ महीने पहले जिस सरकार ने कानून-व्यवस्था का हवाला देकर पैरोल का विरोध किया था, वह चुनाव नजदीक आने पर अपना रुख क्यों बदल रही है। यदि मौजूदा रुख सही है तो पहले किया गया विरोध गलत क्यों था? उन्होंने कहा कि पंजाब की जनता इस कथित दोहरे मापदंड का जवाब मांगती है।
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