कोलकाता , जून 28 -- पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी सरकार हिंसक विरोध-प्रदर्शनों, दंगों, राजनीतिक प्रदर्शनों और तोड़-फोड़ की घटनाओं में शामिल लोगों को आर्थिक रूप से जवाबदेह ठहराने के मकसद से एक सख्त कानूनी ढांचा लाने जा रही है। इसके तहत अधिकारियों को सार्वजनिक और निजी संपत्ति को हुए नुकसान के लिए सीधे आरोपियों से वसूलने का अधिकार मिलेगा।

प्रस्तावित बदलावों के तहत ब्याज सहित बकाया राशि की वसूली की जा सकेगी और प्रशासन को ज़मीन के लगान की वसूली जैसी प्रक्रियाओं के ज़रिए बकाया राशि वसूलने का अधिकार भी मिलेगा।

'पश्चिम बंगाल सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने (संशोधन) विधेयक, 2026' को सोमवार को विधानसभा में पेश किया जाना है। अगर यह विधेयक पास हो जाता है, तो इसमें एक स्वतंत्र संस्था बनाने का प्रावधान होगा।

दावों के निस्तारण के लिए गठित आयोग हिंसा की घटनाओं के दौरान हुए नुकसान का आकलन करेगा, इसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करेगा और उनसे वसूले जाने वाले मुआवजे की राशि निर्धारित करेगा।

प्रस्तावित विधेयक के प्रावधानों के तहत आगजनी, तोड़फोड़, विध्वंसक गतिविधियों, अवैध जमावड़ा, दंगा, भीड़ हिंसा, प्रदर्शन और सार्वजनिक शांति भंग करने वाली ऐसी घटनाओं से सार्वजनिक अथवा निजी संपत्ति को हुए नुकसान के मामलों में मुआवजे का दावा प्रस्तुत किया जा सकेगा।

इस कानून के दायरे में सड़कें, पुल, सरकारी दफ्तर, बसें, ट्राम, अस्पताल, शिक्षण संस्थान और नागरिक सुविधा वाली संपत्तियां, साथ ही दुकानें, घर, कारखाने, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और निजी स्वामित्व वाली अन्य संपत्तियां भी शामिल होंगी।

विधेयक में यह भी प्रस्ताव है कि आर्थिक जवाबदेही केवल उन लोगों तक सीमित नहीं होगी जो सीधे तौर पर तोड़-फोड़ की घटनाओं में शामिल थे। ऐसी घटनाओं में शामिल लोगों को संगठित करने, उकसाने, फंडिंग करने, समर्थन देने या उन्हें पनाह देने के आरोपी व्यक्तियों को भी मुआवज़े के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है।

सरकारी विभागों और एजेंसियों को नुकसान के बारे में ज़िला अधिकारियों को रिपोर्ट देनी होगी, जिसके आधार पर मुआवज़े के दावे प्रस्तावित कमीशन के सामने रखे जाएंगे। जिन निजी लोगों की संपत्ति को नुकसान पहुंचा है, वे भी मुआवज़े के लिए सीधे कमीशन से संपर्क कर सकेंगे।

प्रस्तावित दावा आयोग को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां दी जाएंगी, जिनमें गवाहों को बुलाना, रिकॉर्ड मंगाना, सरकारी दस्तावेज़ों की जांच करना, साइट का निरीक्षण करना और नुकसान का आकलन करने के लिए विशेषज्ञों को शामिल करना शामिल होगा।

इसके लिए जरुरत पड़ने पर इंजीनियरों, मूल्यांकनकर्ताओं और अन्य विशेषज्ञों से भी परामर्श लिया जा सकता है। मुआवजे की राशि निर्धारित करते समय आयोग संपत्ति के बाजार मूल्य, क्षति की प्रकृति, मरम्मत लागत, आरोपी व्यक्तियों को घटना से जोड़ने वाले साक्ष्य, फोटो, वीडियो, पुलिस रिपोर्ट और अन्य प्रासंगिक सामग्री पर विचार करेगा।

विधेयक में दंडात्मक हर्जाने का भी प्रावधान है, जो वास्तविक नुकसान के अतिरिक्त लगाया जा सकता है, लेकिन मूल क्षति की राशि के दोगुने से अधिक नहीं होगा।

प्रस्तावित संशोधन के सख्त प्रावधानों में से एक आयोग को दावे की तिथि से भुगतान होने तक मुआवजे की राशि पर साधारण ब्याज लगाने की अनुमति देता है। इसलिए, भुगतान में देरी से दोषियों पर वित्तीय बोझ बढ़ जाएगा।

इस विधेयक में यह भी प्रावधान है कि यदि निर्देशानुसार मुआवज़ा नहीं दिया जाता है, तो अधिकारियों को भू-राजस्व या सरकारी बकाया की वसूली के समान ही राशि वसूलने का अधिकार होगा।

यदि उसी घटना से संबंधित आपराधिक कार्यवाही चल रही हो, तब भी मुआवज़ा प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से जारी रहेगी।

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