(जयंत रॉय चौधरी से)कोलकाता , अप्रैल 14 -- बंगाल जब अपनी संस्कृति के प्रतीक नए साल 'पोइला बैसाख' के जश्न में डूबा है, तब वहां चुनावी जंग 'बंगालियाना' यानी बंगाली पहचान के मुद्दे पर और तेज हो गई है। राज्य के लोग, चाहे उनकी मातृभाषा कोई भी हो, इस बंगाली पहचान को अपने दिल के बहुत करीब रखते हैं।
कोलकाता की ओर जाने वाले हरे-भरे रास्तों और राजमार्गों पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे हैं। इन पर 'बंगला निजेर मेयेकेई चाय' (बंगाल अपनी ही बेटी को चाहता है) का नारा लिखा है। वहीं, सोशल मीडिया पर तृणमूल कांग्रेस के विज्ञापन 'आबार जीतबे बांग्ला' (बंगाल फिर जीतेगा) का संदेश दे रहे हैं।
कोलकाता से 125 किलोमीटर दूर मेदिनीपुर जिले की रैलियों में मुख्यमंत्री जब 'बंगाली अस्मिता' की बात करती हैं, तो भीड़ 'जोई बांग्ला' के नारों से गूंज उठती है। सुश्री बनर्जी अक्सर अपने भाषणों में 'बाहरी लोगों' द्वारा बंगाल की संस्कृति पर हमला किए जाने का जिक्र करती हैं।
यह सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को जवाब है। भाजपा अपने प्रचार में 'डबल इंजन' सरकार के जरिए विकास लाने का वादा कर रही है और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर तृणमूल नेताओं के खिलाफ हो रही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई को मुद्दा बना रही है।
कुछ लोग तृणमूल के इस सांस्कृतिक दांव को केवल चुनावी पैंतरा मानते हैं, लेकिन बहुत से मध्यम वर्गीय बंगालियों को यह बात सही लगती है। उन्हें डर है कि बाहर से आने वाले लोगों के कारण उनकी भाषा और संस्कृति पर खतरा मंडरा सकता है।
पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने 'यूनीवार्ता' से एक साक्षात्कार में कहा कि बंगाल के लोगों में यह भावना घर कर गई है कि उनके राज्य के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। हालांकि, कोलकाता हमेशा से एक ऐसा शहर रहा है जहां हिंदी, मारवाड़ी, गुजराती और उर्दू बोलने वाले समुदाय दशकों से साथ रहते आए हैं।
पश्चिम बंगाल की 86 प्रतिशत आबादी बंगाली बोलती है, लेकिन बाहर से आए लोग भी यहां की 'बंगालियाना' संस्कृति और दुर्गा पूजा जैसे उत्सवों का हिस्सा बन चुके हैं। फिर भी, पिछले कुछ वर्षों में बंगाली भाषा और संस्कृति को प्राथमिकता देने की मांग सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में फिर से जोर पकड़ने लगी है।
कोलकाता के एक सेवानिवृत अधिकारी समरेंद्र नाथ मुखर्जी ने 'यूनीवार्ता' से एक साक्षात्कार में कहा कि यह केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि बंगालियों के अस्तित्व की लड़ाई है। वहीं, सुंदरबन के एक व्यापारी आशीष हलदर को डर है कि बाहरी लोग राज्य के व्यापार और संसाधनों पर पूरी तरह कब्जा करना चाहते हैं।
दूसरी तरफ, भाजपा भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर तृणमूल को घेर रही है। बालीगंज से भाजपा उम्मीदवार डॉ. शतोरूपा ने यूनीवार्ता' को बताया कि सुश्री बनर्जी भ्रष्टाचार के आरोपों से ध्यान भटकाने के लिए 'बंगाली पहचान' का झूठा नैरेटिव बना रही हैं। उनका कहना है कि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी खुद बंगाली संस्कृति के बड़े प्रतीक थे।
भाजपा का तर्क है कि अगर वे जीतते हैं, तो सरकार बंगालियों की ही बनेगी और कोई बाहरी व्यक्ति शासन नहीं करेगा। हाल ही में ईडी ने पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी और चुनावी रणनीति बनाने वाली संस्था आई-पैक के प्रमुख से जुड़े लोगों पर कार्रवाई की है, जिसे भाजपा अपनी जीत का आधार मान रही है।
बहरहाल, त्योहार के इस माहौल में जहां लोग बाजारों में खरीदारी और होटलों में बंगाली व्यंजनों का लुत्फ उठा रहे हैं, वहीं राजनीतिक दल अपनी-अपनी रणनीति में जुटे हैं। तृणमूल नेता देबाशीष कुमार का कहना है कि अब यह चुनाव भाजपा बनाम तृणमूल नहीं रह गया है, बल्कि यह बंगाल पर नियंत्रण की लड़ाई बन चुका है।
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