जयंत रॉय चौधरी से..कोलकाता , अप्रैल 28 -- रिची रोड की सामान्यतः शांत रहने वाली सड़क पर बेचैनी का असाधारण नजारा नजर आया और मैडॉक्स स्क्वायर के पास स्थित सौ वर्ष से अधिक पुराने सेंट लॉरेंस स्कूल परिसर में लाउडस्पीकरों की आवाज गूंज रही थी।
मतदान अधिकारी, सुरक्षा कर्मी, बसों की लंबी कतारें, अंतिम निर्देश, कागजी औपचारिकताएं और चेहरे पर जिम्मेदारी का तनाव। यह केवल चुनावी तैयारी नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के राजनीतिक भविष्य की धड़कन थी।
ऐसा ही दृश्य दक्षिण बंगाल के अनेक वितरण केंद्रों पर दोहराया जा रहा है, जहां दूसरे और अंतिम चरण के मतदान से पहले प्रशासनिक मशीनरी पूरी ताकत से सक्रिय है। बुधवार को 294 सदस्यीय विधानसभा की 142 सीटों पर मतदान होना है, लेकिन संख्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है इन सीटों का राजनीतिक वजन।
कोलकाता, हावड़ा, हुगली, उत्तर और दक्षिण 24 परगना सहित दक्षिण बंगाल के कई हिस्से केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं बल्कि बंगाल की जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, इतिहास और सत्ता-संतुलन का केंद्र है। राज्य की लगभग आधी आबादी इसी हिस्से में बसती है। उपजाऊ गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा, बंदरगाह, औद्योगिक पट्टी और ऐतिहासिक शहरीकरण ने इसे बंगाल की राजनीतिक आत्मा बना दिया है।
यही कारण है कि चुनाव विश्लेषक इस चरण को निर्णायक मान रहे हैं। वर्ष 2021 में इसी दक्षिणी पट्टी ने तृणमूल कांग्रेस को प्रचंड बढ़त दी थी। यहां तृणमूल ने 123 सीटें जीतकर अपनी सत्ता की नींव मजबूत की थी, जबकि भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) महज 18 सीटों पर सिमट गयी थी। इस बार तस्वीर वही रहेगी या बदल जाएगी, यही सबसे बड़ा प्रश्न है।
तृणमूल कांग्रेस के लिए यह अपनी सबसे मजबूत जमीन बचाने की लड़ाई है, जबकि भाजपा के लिए यही वह रणभूमि है जहां उसे सत्ता परिवर्तन का वास्तविक दावा सिद्ध करना होगा। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगभग रोज राज्य में सक्रिय रहे, केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी ने भी इस संघर्ष को राष्ट्रीय महत्व दे दिया। लेकिन चुनाव केवल रैलियों से नहीं बनता। दक्षिण बंगाल की जमीन के भीतर कई परतें हैं - प्रवासी श्रमिक, मतुआ समुदाय, सीमावर्ती पहचान, मुस्लिम आबादी, बेरोजगारी, और सबसे बढ़कर औद्योगिक क्षरण की लंबी कहानी।
पूर्व राज्यसभा सांसद जवाहर सरकार ने यूनीवार्ता के साथ बातचीत में बताया, "बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर और मतुआ समुदाय के लोग इसी क्षेत्र से हैं। इन्हें मुसलमानों के साथ-साथ, विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान नाम हटाए जाने का सबसे ज़्यादा खामियाज़ा भुगतना पड़ा है।"यह वह क्षेत्र भी है जिसे बंगाल के औद्योगीकरण में आई गिरावट से सबसे ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सेंटर फॉर एशियन स्टडीज़ के पूर्व प्रमुख रणबीर समद्दार कहते हैं, "इसलिए, वोटों को लिस्ट से हटाने के खिलाफ गुस्सा और सत्ता-विरोधी लहर दोनों ही यहाँ असर दिखा सकते हैं और चुनावों पर प्रभाव डाल सकते हैं।"कोलकाता, हावड़ा और हुगली का बेल्ट एक समय औद्योगिक गौरव का केंद्र था, लेकिन आज राजनीतिक भाषणों में "बंगाल का रूहर" बनकर लौट रहा है। कभी जूट मिलों, इंजीनियरिंग इकाइयों और व्यापारिक ऊर्जा का प्रतीक रहा यह इलाका अब बेरोजगारी, पलायन और ठहरे हुए विकास की बहस के केंद्र में है।
साल 2011 की पिछली जनगणना के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया था कि लगभग 5.8 लाख लोग काम की तलाश में पश्चिम बंगाल से दूसरे राज्यों में चले गए थे। यह उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान के बाद किसी भी राज्य से आंतरिक प्रवासियों का चौथा सबसे बड़ा समूह था।
विश्लेषकों का मानना है कि तब से यह संख्या कई गुना बढ़ गयी है, लेकिन सत्यापित आंकड़ों के अभाव में, जानकार अनुमानों के अनुसार यह संख्या 30 से 40 लाख के बीच है। राज्य से लाखों श्रमिकों का बाहर काम के लिए जाना अब केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि चुनावी व्यवहार का हिस्सा बन चुका है। ट्रेनें, बसें और उड़ानें प्रवासी बंगालियों को वापस ला रही हैं। राजनीतिक दल समझ चुके हैं कि बाहर कमाने गया मतदाता अब चुनावी गणित में निर्णायक है। वामपंथी दल रेलवे स्टेशनों तक पहुंचे हैं, जबकि तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों परिवारों के जरिए मतदाताओं को घर लौटने की अपील कर रहे हैं।
भीड़ से भरी ट्रेनें, बसें और यहां तक कि हवाई जहाज़ भी प्रवासी मज़दूरों को 29 अप्रैल को होने वाले चुनावों के लिए उनके घरों तक वापस ला रहे हैं। प्रवासी मज़दूरों के चुनावी महत्व को पहचानते हुए, माकपा के नेतृत्व वाले वामपंथियों ने पार्टी कार्यकर्ताओं को उनके घर जाने के रास्ते में पड़ने वाले रेलवे स्टेशनों पर तैनात किया है, ताकि वे उन तक पहुंच सकें। इसके साथ ही, तृणमूल और भाजपा दोनों ने ही अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दिया है, ताकि वे परिवारों को इस बात के लिए राज़ी कर सकें कि वे अपने बेटों को आठ जुलाई को वोट डालने के लिए वापस बुला लें। इसी दिन राज्य में पंचायत चुनाव होने हैं।
बहरहाल, बंगाल की राजनीति केवल असंतोष से संचालित नहीं होती। यहां सत्ता परिवर्तन ऐतिहासिक रूप से धीमा रहा है। तीन दशक से अधिक वाम शासन के बाद ही परिवर्तन आया था। उसके बाद ममता बनर्जी ने लगातार तीन कार्यकाल तक अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी। इसलिए भाजपा का 'परिवर्तन' नारा जितना जोरदार है, उतना ही कठिन उसकी जमीन पर उतरना भी।
उत्तर बंगाल और जंगलमहल की तुलना में दक्षिण बंगाल का चुनाव कहीं अधिक जटिल है। उत्तर में भाजपा की पैठ पहचान, सीमा और आदिवासी समीकरणों से बनी, लेकिन दक्षिण में सामाजिक गठजोड़, महिला मतदाता, अल्पसंख्यक समर्थन, शहरी असंतोष और ग्रामीण योजनाएं एक साथ टकराती हैं।
लोकसभा चुनाव 2024 ने भी यही संकेत दिया कि दक्षिण बंगाल अब भी तृणमूल की सबसे बड़ी ढाल है। इसलिए इस बार का अंतिम चरण केवल सीटों की गिनती नहीं, बल्कि यह जांच है कि क्या तृणमूल अपनी सामाजिक-सियासी संरचना को बचाए रख पाएगी या भाजपा असंतोष को निर्णायक वोट में बदल सकेगी।
बंगाल के चुनावों में अक्सर कहा जाता है कि यहां मतदान केवल सरकार चुनने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक दिशा तय करने के लिए होता है। दक्षिण बंगाल की यह लड़ाई भी कुछ वैसी ही है। जब बसें मतदान कर्मियों को लेकर बूथों की ओर बढ़ेंगी, तब उनके साथ केवल ईवीएम नहीं होंगी। साथ होगा बंगाल के उद्योग, पहचान, प्रवास, सत्ता और भविष्य पर जनता का फैसला।
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