नयी दिल्ली , मई 06 -- मुस्लिम इंटेलेक्चुअल फ्रंट (एमआईएफ) ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति प्रोफेसर मजहर आसिफ के खिलाफ सोशल मीडिया पर चल रही संगठित और दुर्भावनापूर्ण मुहिम को राष्ट्रीय और शैक्षिक गरिमा के विरुद्ध बताते हुए उसकी कड़ी निंदा की है।
मुस्लिम इंटेलेक्चुअल फ्रंट ने इस संदर्भ में बुधवार को एक राष्ट्रव्यापी ऑनलाइन बैठक आयोजित की जिसमें देशभर से प्रतिष्ठित शिक्षकों, वरिष्ठ शोधकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और अकादमिक जगत के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस बैठक में प्रोफेसर मजहर आसिफ के साथ पूर्ण एकजुटता व्यक्त की गई और उनके खिलाफ चल रही निराधार मुहिम को राष्ट्रीय और शैक्षिक गरिमा के विरुद्ध बताते हुए उसकी कड़ी निंदा की गई।
बैठक में प्रतिभागियों ने इस बात पर गहरी चिंता और खेद व्यक्त किया कि प्रोफेसर आसिफ के हालिया बयान "सभी भारतीयों का डीएनए महादेव से जुड़ा हुआ है" को जानबूझकर, संगठित और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से उसके संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया गया और एक महत्वपूर्ण बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विमर्श को निरर्थक और कृत्रिम विवाद में बदल दिया गया।
वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि वास्तव में यह कथन एक गहरा सांस्कृतिक, दार्शनिक और सूफियाना रूपक है, जो भारत की हजारों वर्षों की साझा परंपरा, सांस्कृतिक निरंतरता, आध्यात्मिक समरसता और सामूहिक चेतना को अभिव्यक्त करता है।
इस दौरान जामिया मिल्लिया इस्लामिया के गेम्स एंड स्पोर्ट्स के डायरेक्टर प्रोफेसर नफ़ीस अहमद ने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक गंभीर, संतुलित और गहन अकादमिक संवाद को जानबूझकर विकृत कर अनावश्यक विवाद में बदल दिया गया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर चल रही यह मुहिम इस बात का संकेत है कि हमारे समाज में सहनशीलता, संवाद और बौद्धिक परंपरा धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।
उन्होंने कहा, "प्रोफेसर मजहर आसिफ एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने हमेशा ज्ञान, संवाद और सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा दिया है। उनका यह बयान भारत की साझा आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है। यह समय है कि हम अकादमिक समुदाय के रूप में एकजुट होकर ऐसी भ्रामक मुहिमों का डटकर सामना करें और बौद्धिक ईमानदारी की रक्षा करें।
प्रोफेसर नफ़ीस अहमद ने यह भी कहा कि प्रोफेसर मजहर आसिफ का बयान एक गहरी सांस्कृतिक और दार्शनिक समझ का परिचायक है। उन्होंने धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में प्रतीकात्मक और तार्किक व्याख्या के अंतर को अत्यंत प्रभावी ढंग से स्पष्ट किया है। सूफी परंपरा में ऐसे रूपक हमेशा मानव एकता और साझा सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक रहे हैं।
मुस्लिम इंटेलेक्चुअल फ्रंट के उपाध्यक्ष डॉ. शहबाज़ आमिल ने कहा, "असहमति एक स्वस्थ अकादमिक परंपरा का हिस्सा है, लेकिन इसे तर्क, शोध और शालीनता के साथ व्यक्त किया जाना चाहिए, न कि ट्रोलिंग और भ्रामक प्रचार के जरिए। किसी भी विद्वान पर व्यक्तिगत हमले करना हमारे नैतिक और बौद्धिक पतन का संकेत है।
जामिया में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मोहसिन अली ने बताया कि वर्षों से लंबित अस्थायी कर्मचारियों की वेतन संबंधी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया गया। सैकड़ों कर्मचारियों को नियमित और समय पर वेतन मिलने लगा। साथ ही प्रशासनिक पारदर्शिता में वृद्धि हुई, फाइलों के निस्तारण में तेजी आई और परिसर में अनुशासन एवं शांति का वातावरण बेहतर हुआ। उन्होंने यह भी बताया कि शिक्षकों के प्रमोशन का मुद्दा, जो कई वर्षों से लंबित था, उसे प्रभावी रूप से हल किया गया, जिससे शिक्षकों में नया उत्साह और विश्वास पैदा हुआ।
बैठक में शामिल डॉ. ज़ुल्फिकार अली अंसारी (एसोसिएट प्रोफेसर, इंडिया-अरब कल्चरल सेंटर, जामिया मिल्लिया इस्लामिया) ने कहा कि प्रोफेसर मजहर आसिफ के नेतृत्व शैली सरल, मानवीय, व्यावहारिक और छात्र-हितैषी है। वे केवल कार्यालय तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कर्मचारियों और छात्रों की समस्याओं को सीधे सुनकर उनका समाधान करने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
मुस्लिम इंटेलेक्चुअल फ्रंट ने एक संयुक्त वक्तव्य जारी करते हुए कहा कि ऐसे शिक्षाविदों का समर्थन किया जाना चाहिए जो शिक्षा, संवाद और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देते हैं, न कि उन्हें ट्रोलिंग और निराधार आलोचना का शिकार बनाया जाए।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित