वाराणसी , अप्रैल 16 -- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा "भारतीय ज्ञान परम्परा के परिप्रेक्ष्य में प्राचीन भारतीय मुद्राएँ: स्रोत, लिपि एवं टकसाल तकनीक" विषय पर सात दिवसीय राष्ट्रीय हैंड्स-ऑन कार्यशाला का शुभारंभ गुरुवार को कला संकाय के प्रेमचंद सभागार में हुआ। यह कार्यशाला 16 से 22 अप्रैल तक चलेगी।

यह कार्यशाला महान इतिहासकार एवं मुद्राविद् स्वर्गीय प्रो. ए.के. नारायण की जन्मशती के उपलक्ष्य में आयोजित की जा रही है।

कार्यक्रम का शुभारंभ परंपरागत दीप प्रज्वलन, महामना पं. मदन मोहन मालवीय तथा प्रो. ए.के. नारायण की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण के साथ हुआ। प्रदर्शन कला संकाय के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत कुलगीत ने कार्यक्रम को गरिमामय वातावरण प्रदान किया।

विभागाध्यक्ष प्रो. एम.पी. अहीरवार ने कहा कि भारतीय इतिहास के आर्थिक एवं सांस्कृतिक पुनर्निर्माण में मुद्राशास्त्र का विशेष महत्व है। उन्होंने बताया कि जन्मशती वर्ष के अंतर्गत यह सातवाँ शैक्षणिक आयोजन है। तत्पश्चात मंचासीन अतिथियों का विभागीय शिक्षकों द्वारा सम्मान किया गया। कार्यशाला की संयोजिका प्रो. मीनाक्षी सिंह ने कार्यशाला के उद्देश्यों एवं रूपरेखा पर प्रकाश डाला।

इस अवसर पर संसाधन व्यक्तियों ने अपने विचार रखे। श्री अमितेश्वर झा, पूर्व निदेशक, आईआईआरएनएस, नासिक ने भारत में मुद्राशास्त्र के विकास एवं प्रगति पर प्रकाश डालते हुए वैज्ञानिक तकनीकों तथा अंतःविषयक दृष्टिकोण के बढ़ते उपयोग पर बल दिया। मनीष वर्मा, क्यूरेटर, हिंदुजा फाउंडेशन ने हिंदुजा फाउंडेशन द्वारा 34,000 से अधिक प्राचीन सिक्कों के संग्रह, संरक्षण एवं संकलन कार्य की जानकारी दी।

भारतीय मुद्रा परिषद् के अध्यक्ष प्रो. पी.एन. सिंह ने विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए विभाग सहित विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों को समाज द्वारा प्राप्त हो रहे सहयोग, शोध गतिविधियों एवं शैक्षिक कार्यक्रमों की चर्चा की।

मुख्य अतिथि प्रो. कमल शील, पूर्व रेक्टर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने अपने उद्बोधन में अपने पिता स्वर्गीय प्रो. ए.के. नारायण के मुद्राविद् के रूप में विद्वतापूर्ण जीवन-यात्रा एवं उनके योगदान को स्मरण किया तथा ऐसे आयोजनों की शैक्षणिक महत्ता पर बल दिया।

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