जयपुर , मार्च 23 -- राजस्थान में श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय जोबनेर कुलगुरु प्रोफेसर डॉ पुष्पेन्द्र सिंह चौहान ने कहा है कि देश में वर्षों से अनेक कृषि तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन अब समय आ गया है कि किसान प्राकृतिक एवं जैविक खेती की ओर अधिक रुझान अपनाएं।
डॉ चौहान ने मंगलवार को विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशालय एवं कृषि एवं केन्द्रीय किसान कल्याण मंत्रालय के संयुक्त तत्वावधान में 23 से 25 मार्च तक तीन दिवसीय 'बीआरसी' उद्यमियों के लिए जैविक एवं प्राकृतिक खेती पर उद्यमिता विकास कार्यक्रम" के शुभारम्भ के अवसर पर यह बात कही। उन्होंने स्वस्थ एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन पर बल देते हुए कहा कि इसके लिए उपयुक्त बाजार व्यवस्था, ब्रांडिंग, पैकेजिंग एवं प्रमाणन प्रणाली का मजबूत होना अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने किसानों को खेती के साथ उद्यमिता अपनाने का आह्वान किया, जिससे "विकसित भारत" के लक्ष्य को साकार किया जा सके। उन्होंने बायोचार उत्पादन तकनीक, वर्मी-कम्पोस्ट, जैविक इनपुट निर्माण एवं फार्म-आधारित उद्योगों के माध्यम से अतिरिक्त आय के अवसरों पर भी प्रकाश डाला।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों, युवाओं एवं उद्यमियों को जैविक एवं प्राकृतिक खेती की उन्नत तकनीकों, मूल्य संवर्धन, विपणन एवं स्वरोजगार के अवसरों से अवगत कराना है, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। उन्होंने स्वस्थ एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन पर बल देते हुए कहा कि इसके लिए उपयुक्त बाजार व्यवस्था, ब्रांडिंग, पैकेजिंग एवं प्रमाणन प्रणाली का मजबूत होना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही उन्होंने किसानों को खेती के साथ उद्यमिता अपनाने का आह्वान किया, जिससे "विकसित भारत" के लक्ष्य को साकार किया जा सके। उन्होंने बायोचार उत्पादन तकनीक, वर्मी-कम्पोस्ट, जैविक इनपुट निर्माण एवं फार्म-आधारित उद्योगों के माध्यम से अतिरिक्त आय के अवसरों पर भी प्रकाश डाला।
इस अवसर पर पद्मश्री जगदीश प्रसाद पारीक ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जैविक एवं प्राकृतिक खेती से अधिक उत्पादन एवं बेहतर गुणवत्ता दोनों संभव हैं। उन्होंने ग्वार, बैंगन, टमाटर एवं प्याज जैसी फसलों में अपने नवाचारों की जानकारी दी तथा भंडारण के दौरान अरंडी के तेल (कैस्टर ऑयल) के उपयोग से अनाज को कीटों से सुरक्षित रखने की पारंपरिक एवं प्रभावी विधि बताई। उन्होंने रासायनिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए जैविक खेती के मूल उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता एवं पर्यावरण संरक्षण को बनाए रखने पर जोर दिया। उन्होंने जैविक प्रमाणन प्रक्रिया को सरल, सुलभ एवं किफायती बनाने की आवश्यकता भी बताई।
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