प्रयागराज , अक्टूबर 10 -- उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के मऊआइमा मे मां दुर्गा के चेहरे पर मुस्कान उकेरते कलाकार बादल पाल के मन में इन दिनों कई चिंताएं हैं। मिट्टी से मां का स्वरूप गढ़ने में जुटे उनके हाथों को अब खरीदारों का इंतजार है। 45 दिनों की अथक मेहनत से तैयार प्रतिमाओं की बिक्री पर ही उनकी कमाई और परिवार की जरूरतें टिकी हैं। दूसरों के घरों और पंडालों में उत्सव के रंग भरने वाले इन कलाकारों की अपनी जिंदगी में उम्मीदों के रंग आर्थिक चुनौतियों के बीच फीके पड़ रहे हैं।

मऊआइमा में प्रतापगढ़-प्रयागराज राष्ट्रीय राजमार्ग के पास ग्राम सुल्तानपुर खास में किराये के कमरे में पश्चिम बंगाल के कृष्णा नगर कोलकाता निवासी बादल पाल अपने तीन साथियों के साथ दुर्गा प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं।वह करीब 25 वर्षों से यहां प्रतिमाएं बना रहे हैं। यह उनके परिवार का पुश्तैनी हुनर है, जिसे वह अपनी आजीविका का आधार बनाए हुए हैं। बांस, लकड़ी, पुआल और मिट्टी से ढांचा तैयार करने के बाद प्रतिमाओं को आकार देना, रंगाई-पुताई और सजावट करना मेहनत भरा काम है।

बादल बताते हैं कि लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिलती। रंग, पेंट, कपड़े और सजावट का सामान कोलकाता से मंगाना पड़ता है। इस बार करीब 50 छोटी-बड़ी प्रतिमाएं तैयार हैं, लेकिन अब तक केवल चार-पांच की बुकिंग हुई है। इनकी कीमत पांच हजार से 20 हजार रुपये तक है।

प्रतिमाएं बिकने के बाद पहले सहयोगियों की मजदूरी और लागत निकालनी होती है।इसके बाद बची रकम से परिवार का खर्च चलता है। बिक्री नहीं होने पर पूंजी फंसने और प्रतिमाओं को बंगाल वापस ले जाने की चिंता अलग है। मां दुर्गा का स्वरूप गढ़ने वाले कलाकारों को अब नवरात्र से उम्मीद है।उनकी चाहत बस इतनी है कि मेहनत का उचित मूल्य मिले, परिवार की जिम्मेदारियां पूरी हों और पुश्तैनी कला के सहारे जीवन की गाड़ी चलती रहे।

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