अगरतला , अप्रैल 2 -- त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी) चुनाव से पहले भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ने के बाद राजपरिवार के वंशज और 'टिपरा मोथा' के संस्थापक प्रद्योत किशोर देबबर्मा ने 'ग्रेटर टिपरालैंड' की अपनी मांग को फिर से जीवित कर दिया है।
श्री किशोर देबबर्मा का गैर-सरकारी संगठन 'टिपरा मोथा' त्रिपुरा, असम, मिजोरम और दक्षिणी बंगलादेश के कुछ हिस्सों को शामिल करते हुए 'ग्रेटर टिपरालैंड' की वकालत करने वाला संगठन था। यह एनजीओ 2021 के पिछले एडीसी चुनाव से ठीक पहले एक राजनीतिक दल में बदल गया था। इसके बाद इसने जनजातीय मुद्दों के संवैधानिक समाधान का आह्वान करते हुए 2023 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा के साथ गठबंधन किया था।
हालांकि, श्री किशोर देबबर्मा ने बुधवार को एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुये दावा किया कि बंगलादेश के कोमिला, चटगांव, चकला रोशनाबाद और ब्राह्मणबरिया जैसे क्षेत्रों को प्रस्तावित 'ग्रेटर टिपरालैंड' में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि 'थान्सा' (एकता) के समर्थन से यह परिकल्पना उस जनजातीय समुदाय को सशक्त बना सकती है, जो पिछले कुछ वर्षों में अल्पसंख्यक हो गया है।
राजनीतिक हलकों में उनकी इन टिप्पणियों ने तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है, क्योंकि ये क्षेत्र 1947 के भारत विभाजन के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश) का हिस्सा बन गये थे, जिससे इस मांग की व्यवहारिकता और ऐतिहासिक संदर्भ पर चिंताएं बढ़ गई हैं।
भाजपा ने इसके जवाब में श्री किशोर देबबर्मा और उनकी पार्टी पर एडीसी चुनावों के दौरान जनजातीय क्षेत्रों में मतदाताओं को लुभाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर वादे करने का आरोप लगाया। ऐसे दावे किये गये कि इस तरह की बयानबाजी पहाड़ों में रहने वाले भोले-भाले और पहली बार राजनीति में भाग लेने वाले लोगों को गुमराह कर सकती है।
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