रांची , दिसंबर 25 -- झारखंड में पेसा नियमावली लागू होने के बाद राज्यभर से प्रतिक्रियाओं का सिलसिला जारी है।

इसी क्रम में गुरुवार को केंद्रीय सरना समिति की ओर से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर राज्य सरकार को इस ऐतिहासिक निर्णय के लिए शुभकामनाएं दी गईं। समिति ने इसे आदिवासी समाज के अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया, हालांकि साथ ही कुछ गंभीर सवाल भी उठाए।

केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने कहा कि पेसा कानून कोई नया कानून नहीं है, बल्कि यह वर्षों से लंबित था। उन्होंने कहा कि "देर से ही सही, लेकिन झारखंड में अब पेसा कानून के तहत नियमावली बनाकर उसे लागू किया गया है, जो निश्चित रूप से स्वागत योग्य है।" उनका कहना था कि इससे अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को अधिक अधिकार और स्वायत्तता मिलेगी तथा आदिवासी समाज की परंपरागत व्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

हालांकि, फूलचंद तिर्की ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पेसा नियमावली में किसी विशेष वर्ग या मिशनरियों के हित में कोई संशोधन किया गया है, तो केंद्रीय सरना समिति इसका पुरजोर विरोध करेगी। उन्होंने कहा कि पेसा एक्ट का मूल उद्देश्य आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति, जल-जंगल-जमीन और ग्राम सभा की सर्वोच्चता को सुरक्षित रखना है, न कि किसी बाहरी प्रभाव को बढ़ावा देना।

उन्होंने सरकार को आगाह करते हुए कहा कि नियमावली बनाते समय और उसे लागू करते हुए संविधान की भावना और पेसा कानून के मूल प्रावधानों से किसी भी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। सरना समिति का मानना है कि यदि किसी संशोधन से आदिवासी समाज के अधिकार कमजोर होते हैं, तो वह स्वीकार्य नहीं होगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में समिति के अन्य पदाधिकारियों ने भी कहा कि पेसा नियमावली का प्रभावी और पारदर्शी क्रियान्वयन बेहद जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जमीन अधिग्रहण, खनन, वन संसाधनों के उपयोग और स्थानीय विकास योजनाओं में ग्राम सभा की भूमिका सर्वोपरि होनी चाहिए।

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