नैनीताल , मई 19 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने पेशेवर वाहन चालकों के हित में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी सड़क दुर्घटना के बाद कोई वाहन चालक वाहन चलाने में पूरी तरह अक्षम (अयोग्य) हो जाता है, तो उसकी कमाने की क्षमता में शत-प्रतिशत कमी माना जाएगा।

यह महत्वपूर्ण फैसला न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी की एकलपीठ ने 'भूपेंद्र सिंह रावत बनाम रवींद्र प्रकाश पंत' मामले में विगत 15 मई को सुनाया लेकिन आदेश की प्रति मंगलवार को मिली।

अदालत ने वर्कमैन कम्पेन्सेशन कमिश्नर एवं जिला मजिस्ट्रेट पिथौरागढ़ के पुराने आदेश में संशोधन करते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाने के निर्देश दिए।

मामले के अनुसार भूपेंद्र सिंह रावत वर्ष 2009 से पेशेवर चालक के रूप में कार्यरत थे। आठ मार्च 2010 को मुनस्यारी क्षेत्र में वाहन चलाते समय वे गंभीर सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए। हादसे में उन्हें कई फ्रैक्चर हुए और मेडिकल बोर्ड की ओर से उन्हें 75 प्रतिशत स्थायी दिव्यांग घोषित किया गया।

निचली अदालत ने भी उनकी दिव्यांगता के बावजूद कमाने की क्षमता में केवल 60 प्रतिशत कमी मानते हुए 2.39 लाख रुपये मुआवजा तय किया था लेकिन उच्च न्यायालय ने शीर्ष अदालत के विभिन्न निर्णयों और 'वीरेन्द्र कुमार' मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई चालक शारीरिक अक्षमता के चलते अपना मूल पेशे से वंचित हो जाता है और उसका ड्राइविंग लाइसेंस भी नवीनीकृत नहीं हो पाता है, तो उसकी आय अर्जित करने की क्षमता पूरी तरह समाप्त मानी जाएगी।

अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए मुआवजे की राशि बढ़ाकर 3.99 लाख रुपये कर दी। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता को कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के तहत 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिया जाना चाहिए। इसी आधार पर अदालत ने सात अप्रैल, 2010 से पूरी राशि पर 12 फीसदी ब्याज देने के निर्देश दिए।

जानकार इस फैसले को पेशेवर चालकों और श्रमिकों के अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण और राहतभरा निर्णय मान रहे हैं।

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