नीमली , फरवरी 25 -- पर्यावरण और विकास के क्षेत्र में कार्यरत सेंटर फॉर साइंस एण्ड एनवायरमेंट और उसकी पत्रिका डाउन टू अर्थ की वर्ष 2026 की 'स्टेट ऑफ इंडियाज़ एनवायरनमेंट' रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि पृथ्वी की नौ में से सात प्रमुख 'ग्रहीय सीमाएं' सुरक्षित दायरे से बाहर जा चुकी हैं और मानव हस्तक्षेप के कारण जीवन-समर्थन प्रणालियां चरम संकट की ओर बढ़ रही हैं।

बुधवार को रिपोर्ट का विमोचन नीमली राजस्थान में आयोजित वार्षिक संवाद कार्यक्रम अनिल अग्रवाल डायलॉग 2026 में किया गया। इसे उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पूर्व सचिव अशोक लवासा तथा सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने संयुक्त रूप से जारी किया।

इस दौरान सुश्री नारायण ने कहा कि यदि पिछले तीन वर्षों के औसत को देखें तो विश्व पहली बार 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की सीमा को पार कर जाएगा। यह संकेत है कि हम सुरक्षा की महत्वपूर्ण सीमा को लांघ रहे हैं। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अपेक्षा से पहले सामने आ रहे हैं और वर्ष 2025 तक विश्व एक अनिश्चित भविष्य के नए दौर में प्रवेश कर चुका है।

रिपोर्ट के अनुसार शोधकर्ताओं ने नौ 'ग्रहीय सीमाएं' चिन्हित की हैं, जिनमें जलवायु परिवर्तन, जैवमंडल की अखंडता, भू-प्रणाली परिवर्तन, मीठे जल में बदलाव, जैव-भू-रासायनिक प्रवाह में परिवर्तन, नवीन रासायनिक तत्वों का प्रवेश, महासागरीय अम्लीकरण, वायुमंडलीय एरोसोल भार तथा समताप मंडलीय ओजोन क्षरण शामिल हैं।

वर्ष 2024 के आंकड़ों के अनुसार इनमें से छह सीमाएं पहले ही सुरक्षित दायरे से बाहर जा चुकी थीं और अब महासागरीय अम्लीकरण भी इस सूची में शामिल हो गया है। रिपोर्ट में 'प्लैनेटरी हेल्थ चेक' अध्ययन का हवाला देते हुए कहा गया है कि औद्योगिक युग की शुरुआत के बाद से महासागरों की सतही अम्लता में 30 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है, जिससे प्रवाल भित्तियों, शंख-घोंघों तथा प्लवकों के अस्तित्व पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।

जैवमंडल की अखंडता के संदर्भ में प्रजातियों के विलुप्त होने की दर प्रति दस लाख प्रजाति-वर्ष में 100 से अधिक बताई गई है, जो सुरक्षित सीमा 10 से काफी ऊपर है। वैश्विक वन क्षेत्र घटकर 59 प्रतिशत रह गया है, जबकि न्यूनतम सुरक्षित सीमा 75 प्रतिशत मानी गई है। मीठे जल के भंडार भी गंभीर स्थिति में हैं। प्लास्टिक, अपर्याप्त परीक्षण वाले रसायन और कृत्रिम पदार्थ जैसे नवीन तत्व तेजी से बढ़ते खतरे के रूप में सामने आए हैं।

संवाद कार्यक्रम में देशभर से लगभग 70 पत्रकारों और 20 से अधिक विषय विशेषज्ञों ने भाग लेकर भारत के समक्ष उपस्थित पर्यावरणीय चुनौतियों पर चर्चा की। सीएसई ने बताया कि आने वाले दिनों में संवाद की चर्चाओं और रिपोर्ट में शामिल विषयों के आधार पर अन्य प्रेस विज्ञप्तियां भी जारी की जाएंगी।

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