पटना , जून 28 -- बिहार में गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय के सहायक कुल सचिव तथा इतिहास एवं संस्कृति से जुड़े विषयों के मशहूर लेखक मिथिलेश के सिंह ने कहा कि प्राचीन, मध्य,औपनिवेशिक तथा समकालीन लेखन में शूद्रों के बारे में अनेक भ्रांतियां मौजूद हैं और उनकी नव प्रकाशित पुस्तक 'शूद्रों का सच' इस विषय पर ऐतिहासिक तथ्यों को तार्किक रूप से सामने लाने का एक शोधपरक प्रयास है।
'अंबेडकर, इस्लाम और वामपंथ' जैसी पुस्तक लिख कर पहले ही स्वनामधन्य हो चुके श्री सिंह ने कहा कि पुस्तक 'शूद्रों का सच' करीब चार वर्षों के शोध एवं अध्ययन का प्रतिफल है। उन्होंने कहा कि यह विषय समय समय पर हिंदुस्तानी और विदेशी लेखकों को आकर्षित करता रहा है, लेकिन परस्पर विरोधी विचारधारा की वजह से शोधार्थियों के कौतूहल में कमी नही आई है।
लेखक ने कहा कि उनके अंदर भी इस विषय को लेकर कौतूहल भरा हुआ था , इसलिये उन्होंने इस विषय पर तथ्यों को परखा, लिखा और अंतिम निर्णय का अधिकार पाठकों के हवाले कर दिया है। उदाहरण के तौर पर यूरोपियन विद्वानों का एक स्कूल कहता है कि भारत में शूद्रों को पढ़ने लिखने या अध्ययन करने का अधिकार नहीं था। इस भ्रांति के सामने उन्होंने अगस्त्य, वाल्मीकि, वेदव्यास और सूत जी जैसे कई प्राचीन भारत के महान शुद्र रचनाकारों का उदाहरण रखा और निर्णय का अधिकार पाठकों पर छोड़ दिया। उसी तरह से जिन लोगों को लगता है कि शुद्र जन्म से दलित, शोषित या वंचित थे, उन्हें यह पुस्तक याद दिलाती है कि भारतीय इतिहास के प्रथम चक्रवर्ती राजा सुदास शुद्र थे। उन्होंने ऋग्वेद के कई श्लोकों की रचना भी की थी।
पुस्तक 'शूद्रों का सच' में तथ्यों के आधार पर बताया गया है कि प्राचीन काल मे ब्राम्हणों और क्षत्रियों का विवाह वैश्य तथा शूद्रों से होता था और इसके कई उदाहरण भी पुस्तक में दिए गए हैं। यह बताया गया है कि व्यास की मां मछुआइन, वशिष्ठ की गणिका और मुनिश्रेष्ठ मदनपाल की मां मल्लाहिन थी। पुस्तक उंस भ्रांति को भी तोड़ती है, जिसमे बहुत से लेखक कहते हैं कि सारे शुद्र अनार्य थे और आर्यों ने उनको दास बना लिया था।
पुस्तक में लेखक यह बताने का प्रयास करते हैं कि समाज भले वर्ग, वर्ण और जाति के फंदे में फंसता गया, लेकिन भारत में लम्बे समय तक सामाजिक समरसता अबाध गति से आगे बढ़ रही थी। सभी वर्ग और वर्ण अपने निर्धारित कार्यों में जुटे थे और जिस हीन भावना को शूद्रों के अस्तिव से जोड़ने का प्रयास किया गया उसका भारतीय समाज में नामोनिशान नही था। यह पुस्तक बेंजामिन टुडेलो, अब्दुर्रज्जाक, फाह्यान अलबरूनी और मार्कोपोलो जैसे लेखकों को कोट कर बताती है कि तब का भारतीय समाज समतामूलक था।
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