मुंबई , मार्च 23 -- महाराष्ट्र विधान परिषद में सोमवार को उस समय राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया जब शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के नेता अनिल परब ने आरोप लगाया कि पिछले सप्ताह सतारा जिला परिषद अध्यक्ष के चुनाव के दौरान हुए हंगामे में पुलिस ने एक मंत्री के साथ मारपीट की थी।
श्री परब ने इस मुद्दे को उठाते हुए सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की सरकार की क्षमता पर सवाल उठाए। उन्होंने टिप्पणी की कि यदि पुलिस एक मंत्री को पीट सकती है, तो यह आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता की बात है। उन्होंने सत्तारुढ़ गठबंधन के नेताओं पर भी कटाक्ष करते हुए उन पर भारतीय जनता पार्टी का नाम लेने से बचने और सत्ता के लिए अपने आत्मसम्मान से समझौता करने का आरोप लगाया।
श्री परब ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को निशाना बनाया और चुनौती दी कि यदि उनके नेता वास्तव में आत्मसम्मान के लिए खड़े हैं, तो उन्हें सत्ता छोड़ देनी चाहिए। उन्होंने घटना के दौरान मंत्रियों की चुप्पी की आलोचना की और आरोप लगाया कि शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दोनों के मंत्रियों के साथ मारपीट की गई, फिर भी वे अब सदन के भीतर सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं।
राज्य के मंत्री उदय सामंत ने इस हमले का जवाब देते हुए पलटवार किया और शिवसेना के विद्रोह के दौरान दिए गए पुराने बयानों को याद करते हुए श्री परब पर पाखंड का आरोप लगाया। यह बहस जल्द ही शाब्दिक युद्ध में बदल गई, जो राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में गहरे मतभेदों को दर्शाती है।
मंत्री शंभुराज देसाई ने भी सदन को संबोधित किया और इस घटना को अपने चार दशक के राजनीतिक जीवन में अभूतपूर्व बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि सतारा जिला परिषद में बहुमत होने के बावजूद उनके सदस्यों को रोका गया, उनके खिलाफ मामले दर्ज किए गए और मतदान कक्ष में प्रवेश करने से ठीक पहले गिरफ्तारियां की गईं। श्री देसाई ने दावा किया कि उन्हें कार्यक्रम स्थल से कुछ ही फीट की दूरी पर पुलिस ने बलपूर्वक रोका और उन्हें चोटें आईं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके कपड़ों पर खून के धब्बे तक दिखाई दे रहे थे।
श्री परब ने कथित "ढोंगी बाबा" विवाद पर भी विस्तृत चर्चा की मांग की और सत्र समाप्त होने से पहले गहन जांच का आह्वान किया। सरकार ने आश्वासन दिया कि इस मामले पर आधिकारिक बयान दिया जाएगा।
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