छत्रपति संभाजीनगर , मई 03 -- पुणे जिले के नसरापुर में चार साल की मासूम बच्ची के साथ हुए हमले और उसकी हत्या ने पूरे महाराष्ट्र में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। इसी बीच, सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) डॉ. रियाज देशमुख ने आरोप लगाया है कि यह मामला आरोपी की पहचान उजागर करने के संबंध में मीडिया के कुछ वर्गों के दोहरे मापदंडों को उजागर करता है।

इस अपराध को "मानवता के सीने में खंजर घोंपना" बताते हुए डॉ. देशमुख ने कहा कि इस घटना से जनता में भारी गुस्सा है और नागरिक आरोपी के लिए कठोरतम सजा की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आये हैं। हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि टीवी चैनलों, अखबारों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और समाचार पोर्टलों के व्यापक कवरेज के बावजूद, शुरुआती खबरों में आरोपी की पहचान उजागर क्यों नहीं की गयी?बता दें कि वारदात के कुछ घंटों बाद ही शुक्रवार को आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया था।

उनके अनुसार, अधिकतर सुर्खियों में आरोपी का नाम या उसकी पृष्ठभूमि बताये बिना उसे '65 वर्षीय व्यक्ति', 'बुजुर्ग आरोपी' या 'स्थानीय ग्रामीण' जैसे सामान्य विवरणों के साथ संबोधित किया गया। उन्होंने कहा कि लोगों ने मराठी, हिंदी और अंग्रेजी मीडिया के साथ-साथ डिजिटल माध्यमों पर भी आरोपी की पहचान की पुष्टि करने की कोशिश की, लेकिन मुख्यधारा की मीडिया रिपोर्टों में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिली।

डॉ. देशमुख ने आगे कहा कि अंततः सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं और स्थानीय स्तर से मिली जानकारी के माध्यम से आरोपी की पहचान हो सकी।

अपने बयान में उन्होंने तर्क दिया कि इस मामले ने रिपोर्टिंग के तौर-तरीकों में स्पष्ट विसंगतियों को लेकर चिंताओं को फिर से जन्म दे दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में अतीत की कई घटनाओं में देखा गया है कि जब आरोपी मुस्लिम समुदाय के होते हैं तो उनके नाम और धार्मिक पहचान को सुर्खियों में प्रमुखता से दिखाया जाता था। इसके विपरीत, अन्य समुदायों के आरोपियों से जुड़े मामलों में रिपोर्ट अक्सर संयमित भाषा अपनाती है और व्यक्तियों के नाम लेने से बचती है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह के अंतर से चयनात्मक रिपोर्टिंग का आभास होता है, जो पत्रकारिता में जनता के भरोसे को प्रभावित कर सकता है। अपराध को धर्म या जाति से न जोड़ने पर बल देते हुए डॉ. देशमुख ने कहा कि एक अपराधी की पहचान उसकी सामुदायिक पृष्ठभूमि के बजाय उसके किये अपराध से तय होनी चाहिए।

पत्रकारिता की जिम्मेदारी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पीड़ितों, विशेष रूप से नाबालिगों की पहचान की रक्षा करना एक कानूनी और नैतिक दायित्व है, लेकिन एक आरोपी व्यक्ति की पहचान, विशेष रूप से गिरफ्तारी के बाद आमतौर पर सार्वजनिक जानकारी का हिस्सा होती है। उन्होंने इस मामले में ऐसी जानकारी छिपाने के पीछे के तर्क पर सवाल उठाया।

डॉ. देशमुख ने मीडिया से आत्मनिरीक्षण करने का भी आह्वान किया और कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में रिपोर्टिंग में निरंतरता, पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाये रखने की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने तर्क दिया कि अलग-अलग तरीके अपनाने के बजाय एक समान मानक होना चाहिए- या तो सभी मामलों में आरोपियों के नाम उजागर किये जाएं या सभी मामलों में उन्हें छिपाया जाए।

डिजिटल युग में जनता की भूमिका पर कहा कि नागरिक अब विसंगतियों पर सवाल उठा रहे हैं, खबरों की तुलना कर रहे हैं और जवाबदेही मांग रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि चयनात्मक रिपोर्टिंग और कथित पक्षपात की अब पहले से कहीं अधिक बारीकी से समीक्षा की जा रही है।

अपने बयान के अंत में डॉ. देशमुख ने कहा कि हालांकि मुख्य ध्यान पीड़ित को न्याय दिलाने और आरोपी को कड़ी सजा सुनिश्चित करने पर होना चाहिए, लेकिन इस घटना ने मीडिया की नैतिकता पर एक व्यापक बहस छेड़ दी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विश्वसनीयता और सार्वजनिक विश्वास बनाये रखने के लिए निरंतर और निष्पक्ष रिपोर्टिंग आवश्यक है।

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