मुंबई , नवंबर 09 -- महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के बेटे पार्थ पवार की साझेदारी वाली एक कंपनी को पुणे में सरकारी जमीन की खरीद रद्द होने के बावजूद युवा व्यवसायी को दोहरा झटका लगा है।
जब इस मामले में विवाद बढ़ा तो इस आपत्तजिनक लेनदेन को रद्द कर दिया गया लेकिन फिर भी कंपनी को इस रद्द किए गए सौदे से संबंधित भारी स्टाम्प शुल्क का भुगतान करना होगा।
राजस्व विभाग के अधिकारियों के अनुसार, लेनदेन रद्द होने के बावजूद कंपनी को अभी भी इस संबंध में कुल 42 करोड़ रुपये का भुगतान करना पड़ेगा। इसमें 300 करोड़ रुपये की भूमि खरीद के पंजीकरण के लिए कुल मूल्य का सात प्रतिशत 21 करोड़ रुपये तथा समझौता रद्द करने की लागत के रूप में अतिरिक्त 21 करोड़ रुपये शामिल हैं।
यह विवाद तब सामने आया था जब पता चला कि भूमि अधिग्रहण में सरकारी प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया। राज्य सरकार के स्वामित्व वाली यह संपत्ति कथित रूप से उसके वास्तविक बाजार मूल्य के लगभग छठे हिस्से पर बेची जा रही थी जिसकी अनुमानित कीमत 1,800 करोड़ रुपये है। इसके अलावा, इस लेन-देन में कथित रूप से स्टाम्प शुल्क में छूट का लाभ भी प्राप्त हुआ क्योंकि दावा किया गया था कि भूमि को सूचना प्रौद्योगिकी पार्क के लिए विकसित किया जाएगा।
अधिकारियों ने पुष्टि कि है कि वर्तमान सरकारी नियमों के अनुसार राज्य के स्वामित्व वाली भूमि निजी संस्थाओं को हस्तांतरित नहीं की जा सकती है जिससे यह सौदा कानूनी रूप से अवैध हो गया। इस खुलासे के बाद तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया शुरू हो गयी और विपक्षी दलों ने अजित पवार के इस्तीफे की मांग की तथा कहा कि इस घटना से सरकारी भूमि बिक्री प्रक्रियाओं में गंभीर उल्लंघन का पता चला है।
उपमुख्यमंत्री ने शुक्रवार को अपने स्पष्टीकरण में कहा था कि उन्हें भूमि खरीद के संबंध में कोई पूर्व जानकारी नहीं थी और कहा कि लेनदेन पूरी तरह से खारिज हो चुका है। हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उसी दिन थोड़ा अलग रुख अपनाते हुए कहा कि किसी भी औपचारिक रद्दीकरण प्रक्रिया से पहले लेनदेन का पूरा होना एक आवश्यक कानूनी शर्त है। उन्होंने कहा कि कोई भी कार्रवाई शुरू करने से पहले स्टाम्प शुल्क संबंधी दायित्वों को पूरा किया जाना चाहिए।
विधान परिषद में पूर्व विपक्षी नेता अम्बादास दानवे ने इस मामले में राज्य सरकार की कार्यशैली की आलोचना की और कहा कि इस मामले में सरकार की ओर से विरोधाभासी बयान आये। उन्होंने इस संबंध में श्री पवार का दावा कि सौदा रद्द हो चुका है और मुख्यमंत्री के इस कथन का जिक्र किया कि अगर समझौता कानूनी रूप से पूरा नहीं हुआ है तो इसे रद्द नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री के बयानों में विरोधाभास है।
इस मामले में विवाद तब और गहरा हो गया जब यह बात सामने आयी कि संबंधित फर्म में 99 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने के बावजूद पार्थ पवार को इस संबंध में दर्ज पुलिस शिकायत में आरोपी नहीं बनाया गया। इस मुद्दे पर बोलते हुए, मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि शिकायत कंपनी के खिलाफ दर्ज की गई थी, किसी व्यक्तिगत हितधारक के खिलाफ नहीं। उन्होंने आगे कहा कि जांच के दौरान कंपनी के लेन-देन में हस्ताक्षर का अधिकार रखने वाले सभी लोगों की जांच की जाएगी और जो भी गलत कामों में शामिल पाए जाएंगे उनके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
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