पुणे , जून 29 -- महाराष्ट्र में पुणे की एक विशेष फास्ट-ट्रैक अदालत ने सोमवार को महाराष्ट्र के नसरापुर में साढ़े तीन वर्ष की बच्ची से दुष्कर्म और हत्या मामले में एक व्यक्ति को फांसी की सजा सुनायी।

हाल के वर्षों में बाल यौन उत्पीड़न मामलों में यह सबसे त्वरित फैसलों में से एक है। इस मामले में अपराध के महज 60 दिनों के भीतर न्यायालय ने फैसला सुना दिया।

विशेष न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसआर सालुंके ने आरोपी भीमराव कांबले को अपहरण, गंभीर यौन उत्पीड़न, दुष्कर्म और हत्या के लिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया। न्यायालय ने आरोपी को चार दिन पहले ही दोषी करार दे दिया था और सजा पर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे सोमवार को सुनाया गया।

इस मामले को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' श्रेणी का बताते हुए अदालत ने कहा कि अपराध की क्रूरता को देखते हुए मौत की सजा ही उचित है। अपनी टिप्पणी में न्यायाधीश ने कहा कि आरोपी ने बच्ची की मौत के बाद भी उसके साथ यौन उत्पीड़न जारी रखा। उन्होंने इस पर भी गौर किया कि पीड़िता के शरीर पर चोट के 18 निशान थे, जो अदालत के अनुसार चरम क्रूरता को दर्शाते हैं।

अदालत ने कहा कि अपराध की प्रकृति को देखते हुए मृत्युदंड भी 'अपर्याप्त' प्रतीत होता है।

घटना के 16 दिनों के भीतर पुलिस के आरोप पत्र दाखिल किये जाने के बाद अभियोजन पक्ष ने तेज गति से सुनवाई पूरी की। कार्यवाही के दौरान सरकारी अधिवक्ताओं ने 55 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज कराये। अभियोजन पक्ष ने अपना मामला साबित करने के लिए फॉरेंसिक, मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का सहारा लिया।

इस दौरान निर्भया मामले, शंकर खाड़े मामले, बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य और बशर अली मामले सहित कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया गया। साथ ही मृत्युदंड से जुड़े 12 अन्य उदाहरणों को भी सामने रखा गया।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने मजबूत और अकाट्य सबूत पेश किये हैं, जिससे आरोपी के बचने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती। न्यायालय ने यह भी कहा कि सजा सुनाने से पहले अभियोजन और बचाव दोनों पक्षों को अपनी विस्तृत दलीलें पेश करने का पूरा मौका दिया गया था।

न्यायमूर्ति सालुंके ने जांच अधिकारियों की सराहना की और इसे एक विस्तृत और पेशेवर जांच बताया। इसके साथ ही उन्होंने पूरी मेहनत और ईमानदारी से मामले की पैरवी करने के लिए विशेष लोक अभियोजक की भी प्रशंसा की।

यह फैसला पीड़िता के परिवार, आम नागरिकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों की मौजूदगी में सुनाया गया, जो इस फैसले का इंतजार कर रहे थे।

इस मामले ने पूरे महाराष्ट्र को झकझोर कर रख दिया था।

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