पीलीभीत , सितंबर 15 -- दिल्ली-एनसीआर में बैठकर पीलीभीत सहित अन्य जिलों के लोगों को फर्जी सीबीआई और ईडी अधिकारी बनकर लाखों की ठगी करने वाले गिरोह के गिरफ्तार आधे दर्जन सदस्यों की उत्तर प्रदेश गिरोहबंद (गैंग्स्टर) एक्ट के तहत उनकी अवैध संपत्तियों को कुर्क करने की पुलिस ने प्रक्रिया तेज कर दी है। अगस्त 2024 में पीलीभीत के एक परिवार को शिकार बनाने के बाद इस गैंग से पर्दा उठा था।

पुलिस अधीक्षक सुकीर्ति माधव के अनुसार जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह के साथ संयुक्त बैठक में गैंग चार्ट को मंजूरी मिलने के बाद दर्ज हुआ यह गैंग्स्टर का मुकदमा साइबर अपराधियों के लिए एक कड़ा संदेश है कि कानून के हाथ उनके गिरेबान तक पहुंच सके।

पुलिस के अनुसार इस शातिर गिरोह ने अगस्त 2024 में पीलीभीत के कोतवाली क्षेत्र स्थित जेल लाइन निवासी जगमोहन सैनी के परिवार को अपना शिकार बनाया। सैनी परिवार को कई दिनों तक डिजिटल अरेस्ट के खौफ में रखकर लाखों रुपये ठग लिए गए। मामले की शिकायत पर प्रभारी निरीक्षक वीरेंद्र राम भारती ने टीम के साथ डिजिटल फुटप्रिंट्स के जरिए इस अंतरराज्यीय नेटवर्क को बेनकाब किया। पुलिस ने गिरफ्तारी के दौरान इनके पास से भारी मात्रा में मोबाइल फोन, नकदी, फर्जी आधार कार्ड, बैंक की पासबुक और सिम कार्ड बरामद किए और साक्ष्य संकलन के बाद न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया।

पीलीभीत पुलिस ने इस मामले में गैंग के छह सदस्यों को गिरफ्तार किया, अब उनकी आर्थिक जड़ें काटने के लिए बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। एसपी के अनुसार पुलिस का दायरा अब केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि ठगी के पैसों से दिल्ली और एनसीआर (नोएडा, ग्रेटर नोएडा) में खड़ी की गई अचल संपत्तियों की कुंडली खंगाली जा रही है।

सहायक पुलिस अधीक्षक (एएसपी) नताशा गोयल के अनुसार संबंधित जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों को आधिकारिक पत्र भेजा गया है। इसमें आरोपियों की चल-अचल संपत्ति का पूरा ब्योरा मांगा गया है, ताकि कुर्की की वैधानिक प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी की जा सके।

पुलिस की विवेचना में यह पाया गया कि यह एक संगठित अपराध सिंडिकेट था। ग्रेटर नोएडा का मनीष कुमार इस गैंग का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है। उसी के इशारे पर दिल्ली और नोएडा में बैठे विकास वर्मा, राजेंद्र शर्मा, प्रशांत चौहान, संजय बाबी और फैसल सिद्दीकी जैसे शातिर गुर्गे काम करते थे। वारदात को अंजाम देने के लिए ये आरोपी खुद को सीबीआई, ईडी, सीबीसीआईडी, मुंबई पुलिस और एनसीआरबी का अधिकारी बताते थे। इसके बाद ये शातिर अपराधी व्हाट्सएप वीडियो और ऑडियो कॉल के जरिए फर्जी अरेस्ट वारंट भेजकर पीड़ितों में दहशत पैदा करते थे। मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर पीड़ितों और उनके रिश्तेदारों के खातों से लाखों रुपये ट्रांसफर करा लेना ही इनकी आय और जीवनयापन का मुख्य जरिया था।

पुलिस अधिकारी का कहना है कि ऐसे अपराधों को जड़ से खत्म करने का सबसे कारगर तरीका अपराधियों के उस आर्थिक साम्राज्य को नेस्तनाबूद करना है। गिरोह की गतिविधियों से आम लोगों में इतना भय था कि लोग रिपोर्ट दर्ज कराने और गवाही देने से भी कतराते थे।

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