श्रीनगर , अक्टूबर 25 -- पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर कर राज्य के उन सभी विचाराधीन कैदियों की तत्काल वापसी की मांग की है, जो वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के बाहर विभिन्न जेलों में बंद हैं।
सुश्री मुफ़्ती ने दायर याचिका में अदालत से आग्रह किया है कि ऐसे सभी कैदियों को जम्मू-कश्मीर की स्थानीय जेलों में स्थानांतरित करने का आदेश दिया जाये, जब तक कि संबंधित अधिकारी किसी विशिष्ट मामले में लिखित कारण प्रस्तुत करके यह साबित न कर दें कि उन्हें बाहर रखा जाना आवश्यक है। याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसे सभी मामलों की अदालत द्वारा हर तीन महीने में समीक्षा की जानी चाहिए।
याचिका में कहा गया है, "याचिकाकर्ता एक राजनीतिक कार्यकर्ता और पूर्व मुख्यमंत्री हैं। उनसे कई कैदियों के परिवारों ने विचाराधीन कैदियों की दुर्दशा के संबंध में सरकार से हस्तक्षेप करने की अपील की है।"सुश्री मुफ्ती ने कहा कि उन्होंने इस संबंध में सरकार से बार-बार अनुरोध किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद उन्हें जनहित में यह याचिका दायर करनी पड़ी।
याचिका में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत परमादेश याचिका दायर कर केंद्र, जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग और पुलिस प्रमुख को सभी विचाराधीन कैदियों को वापस जम्मू-कश्मीर की जेलों में स्थानांतरित करने का निर्देश देने की मांग की गयी है।
सुश्री मुफ्ती ने अपनी याचिका में कहा है कि पांच अगस्त , 2019 को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद , जम्मू और कश्मीर के कई निवासी, जो यहां मामलों में जांच या मुकदमे के दायरे में थे, उन्हें राज्य के बाहर की जेलों में स्थानांतरित कर दिया गया था।
उन्होंने कहा, " एफआईआर और मामले जम्मू-कश्मीर में दर्ज किये जाते हैं, लेकिन कैदियों को सैकड़ों किलोमीटर दूर जेलों में रखा जाता है, जिससे उनके परिवारों के लिए उनसे मिलना, वकीलों से परामर्श करना और न्याय तक पहुंच पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।"याचिका में कहा गया है कि कैदियों को दूरदराज की जेलों में भेजने की यह नीति संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है, जो निष्पक्ष सुनवाई, वकील तक पहुंच और परिवार के साथ संपर्क के मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है।
सुश्री मुफ़्ती ने कहा कि मॉडल जेल मैनुअल समेत अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कानून, विचाराधीन कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार, वकीलों तक पहुंच और उनके परिवारों से संपर्क सुनिश्चित करने का आदेश देते हैं। उनके अनुसार विचाराधीन कैदियों को दोषी अपराधियों से भी बदतर परिस्थितियों में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है।
याचिका में न्यायालय से एक स्पष्ट 'पहुंच प्रोटोकॉल' स्थापित करने का भी अनुरोध किया गया है ताकि कैदियों को हर सप्ताह अपने परिवारों से मिलने का अधिकार मिले और उन्हें बिना किसी बाधा के अपने वकीलों से बातचीत करने का अवसर मिले।
सुश्री मुफ्ती ने मांग की है कि दो सदस्यीय निगरानी और शिकायत समिति का गठन किया जाये, जिसमें एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के एक सदस्य शामिल हों। इस समिति को विचाराधीन कैदियों के स्थान, बैठकों के रिकॉर्ड, वकीलों से संपर्क और अदालत में उनकी उपस्थिति की निगरानी करनी चाहिए तथा हर दो महीने में अदालत को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए।
उन्होंने मांग की है कि जब तक इन कैदियों को वापस नहीं लाया जाता, सरकार को उनके परिवारों के यात्रा और आवास खर्च के लिए पर्याप्त मुआवजा प्रदान करना चाहिए ताकि वे महीने में कम से कम एक बार अपने प्रियजनों से मिल सकें।
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