नागपुर , मई 17 -- 'श्रीलंका फ्रीडम पार्टी' के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और श्रीलंका के पूर्व मंत्री डॉ. विजयादासा राजपक्षे ने कहा है कि श्रीलंका में ऊपरी तौर पर शांति दिखने के बावजूद जनता में असंतोष लगातार बरकरार है और नागरिक स्थिरता, विकास तथा प्रभावी नेतृत्व की उम्मीद कर रहे हैं।

श्री राजपक्षे ने शनिवार को यहां आयोजित 'विश्व शांति सम्मेलन' में देश के आर्थिक संकट के लिए तत्कालीन सरकार और राष्ट्रपति की नीतिगत विफलताओं को जिम्मेदार ठहराया। वह लगभग तीन दशकों तक श्रीलंका के लगातार कई राष्ट्रपतियों के कानूनी और नीतिगत सलाहकार रह चुके हैं।

उन्होंने कहा, "सरकार को कई मौकों पर नीतिगत बदलाव करने की सलाह दी गयी थी, लेकिन सिफारिशों को नजरअंदाज कर दिया गया। नतीजतन देश आर्थिक तबाही के गर्त में चला गया, जिससे जनता का गुस्सा भड़क उठा।"एक शिक्षाविद्, अर्थशास्त्री और बौद्ध विचारक के रूप में प्रसिद्ध राजपक्षे कानून, शिक्षा, बुद्ध शासन, श्रम और जेल सुधार जैसे प्रमुख मंत्रालयों का कार्यभार संभाल चुके हैं और उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव भी लड़ा था। 'गलत फैसलों' के प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि दोषपूर्ण नीतियों के कारण इस शांतिप्रिय बौद्ध राष्ट्र को हिंसा का सामना करना पड़ा था।

उन्होंने कहा कि हालांकि चुनावों के बाद स्थिति में कुछ हद तक सुधार हुआ है, लेकिन वर्तमान नेतृत्व अब भी जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। निकट भविष्य में राजनीतिक बदलाव और नये चुनाव होने की संभावना दिखाई दे रही है।" श्री राजपक्षे ने कहा कि डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने 1950 में 'विश्व बौद्ध सम्मेलन' में भाग लेने के लिए श्रीलंका का दौरा किया था और बाद में नागपुर में बौद्ध धर्म अपनाया था।

उन्होंने 'वेसाक दिवस' (बुद्ध पूर्णिमा) को वैश्विक मान्यता दिलाने के प्रयासों की शुरुआत करने का श्रेय डॉ. अंबेडकर को दिया।

श्रीलंका के आर्थिक और राजनीतिक संकट के दौरान भारत के सहयोग के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को धन्यवाद देते हुए श्री राजपक्षे ने कहा कि भारत ने महत्वपूर्ण वित्तीय और मानवीय सहायता प्रदान की थी। इसमें स्वास्थ्य सेवा सहायता, बुनियादी ढांचा सहायता और 500 एंबुलेंस शामिल थीं।

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