पटना , जनवरी 23 -- बिहार में सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक बदलाव की शुरुआत हो चुकी है, जहां अब पिंक बसों की पूरी कमान महिलाओं के हाथ में सौंपे जाने की तैयारी है।

यह पहल न सिर्फ महिलाओं की सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करेगी, बल्कि उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक सम्मान और आत्मविश्वास को भी नई दिशा देगी।

इस बदलाव की बुनियाद औरंगाबाद स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ड्राइविंग एंड ट्रैफिक रिसर्च (आईडीटीआर) में रखी जा रही है, जहां वर्तमान में 13 महिलाएं रोजाना आठ घंटे पिंक बस चलाने का विशेष प्रशिक्षण ले रही हैं। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें आधुनिक ड्राइविंग सिम्युलेटर, सड़क सुरक्षा नियम, इंजन की तकनीकी जानकारी और वाहन रखरखाव की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। लक्ष्य है कि मार्च माह तक ये महिलायें हेवी मोटर व्हीकल (एचएमवी) लाइसेंस प्राप्त कर पिंक बसों की स्टियरिंग संभालें।

आईडीटीआर के प्रशिक्षक अनिरुद्ध कुमार बताते हैं कि यह प्रशिक्षण सिर्फ ड्राइविंग तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि 'ये महिलायें यहां आत्मविश्वास, निर्णय क्षमता और नेतृत्व कौशल भी विकसित कर रही हैं। हर दिन उनका आत्मबल बढ़ता दिखाई दे रहा है।'महिला सशक्तिकरण की यह तस्वीर गणतंत्र दिवस के अवसर पर भी देखने को मिलेगी, जब गांधी मैदान में परिवहन विभाग की झांकी में महादलित महिलाएं पिंक बस चलाती नजर आयेंगी। ये छह महिलायें बिहार की पहली महिला बस चालक बनकर इतिहास रचेंगी और समाज को एक सशक्त संदेश देंगी।

राज्य सरकार की योजना के तहत पिंक बस परियोजना को और विस्तार देने की तैयारी है। जल्द ही 250 महिला चालकों और 250 महिला संवाहकों (कंडक्टरों) की नियुक्ति की जायेगी। वर्तमान में पटना, गया, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार सहित राज्य के 10 जिलों में 100 पिंक बसें संचालित हो रही हैं जो प्रतिदिन सैकड़ों महिलाओं को सुरक्षित और भयमुक्त यात्रा का भरोसा दे रही हैं।

खास बात यह है कि आने वाले समय में इन पिंक बसों में चालक, संवाहक और यात्री तीनों महिलायें ही होंगी। यह पहल इस बात का प्रतीक है कि पिंक बस अब सिर्फ परिवहन का साधन नहीं रही, बल्कि यह महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सामाजिक बदलाव की सवारी बन चुकी है।

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