मांड्या , जुलाई 26 -- कर्नाटक में बारिश की कमी के कारण ऐतिहासिक शिवनासमुद्र जलविद्युत संयंत्र को बंद करना पड़ा है।कावेरी नदी में पानी का स्तर बेहद कम हो जाने से एशिया के इस पहले जलविद्युत संयंत्र में पिछले करीब छह हफ्तों से बिजली उत्पादन पूरी तरह ठप्प है।

मालवल्ली तालुका में स्थित सदी पुराना यह बिजलीघर 1902 से ही कर्नाटक के औद्योगिक विकास को रफ्तार देता रहा है। कावेरी बेसिन में पानी की बेहद कम आवक के कारण यह संयंत्र बिजली बनाने में असमर्थ है। यह स्थिति दर्शाती है कि कमज़ोर मानसून का असर राज्य में बिजली उत्पादन और खेती-किसानी, दोनों पर कितना गंभीर रूप से पड़ रहा है।

आमतौर पर लगभग 42 मेगावाट बिजली पैदा करने वाले इस संयंत्र को टरबाइन चलाने के लिए कम से कम 1,450 क्यूसेक पानी के बहाव की ज़रूरत होती है। कावेरी नदी का पानी सूखकर नाममात्र रह गया है और कृष्णराज सागर तथा कबिनी जलाशयों का जलस्तर भी गिर गया है। इसी वजह से अधिकारी काम फिर से शुरू नहीं कर पा रहे हैं।

सूत्रों के मुताबिक, बिजली उत्पादन तभी शुरू हो सकता है जब कृष्णराज सागर या कबिनी जलाशयों से पर्याप्त पानी छोड़ा जाए, लेकिन राज्य में जारी जल संकट को देखते हुए पानी छोड़ना बेहद कठिन बना हुआ है। इस ऐतिहासिक बिजलीघर का बंद होना ऐसे समय में हुआ है जब कर्नाटक सूखे जैसे हालात और पनबिजली के घटते संसाधनों के दोहरे संकट का सामना कर रहा है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1902 में शुरू हुआ शिवनासमुद्र बिजलीघर, एशिया की पहली जलविद्युत परियोजना के रूप में भारत के औद्योगिक इतिहास में एक खास पहचान रखता है। महाराजा नालवाड़ी कृष्णराज वाडयार के शासनकाल में सोची गई और तत्कालीन दीवान सर के. शेषाद्रि अय्यर की देखरेख में पूरी हुई इस परियोजना ने कोलार स्वर्ण खदानों को बिजली पहुंचाई थी। इसके लिए करीब 147 किलोमीटर लंबी बिजली लाइन बिछाई गई थी, जो उस दौर में दुनिया की सबसे लंबी लाइनों में से एक थी।

अमेरिका और स्विट्जरलैंड से मंगवाई गई मशीनों से तैयार इस परियोजना ने भारत में बड़े पैमाने पर जलविद्युत उत्पादन की शुरुआत की और राज्य के औद्योगीकरण की मज़बूत नींव रखी।

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