लाहौर , नवंबर 09 -- पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था का रीढ़ माना जाने वाला विनिर्माण क्षेत्र हाल के वर्षों में अपने सबसे गंभीर मंदी का सामना कर रहा है।
एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार पिछले छह वर्षों में क्षेत्र में निजी निवेश में 46 प्रतिशत से ज़्यादा की गिरावट दर्ज की गयी है। इस भारी गिरावट ने उद्योगपतियों और अर्थशास्त्रियों के बीच चिंता पैदा कर दी है। इनका मानना है कि उत्पादन और मूल्यवर्धन में ठहराव से देश के विकास पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
लाहौर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एलसीसीआई) के कार्यकारी समिति के वरिष्ठ सदस्य अली इमरान आसिफ के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र में निजी निवेश वित्तीय वर्ष 2018-19 के 706 अरब रुपये से घटकर 2024-25 में 377 अरब रुपये रह गया है। यह एक दशक में अब तक के सबसे कम औद्योगिक विस्तार को दर्शाता है।
श्री आसिफ ने कहा कि निवेश का मौजूदा स्तर बड़े उद्योगों में मशीनों और परिसंपत्तियों में होने वाले मूल्यह्रास की भरपाई के लिए भी पर्याप्त नहीं है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "हम सिर्फ़ एक अस्थायी मंदी का सामना नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम अपने औद्योगिक आधार में क्षय का भी सामना कर रहे हैं।" उन्होंने कहा कि प्रतिस्पर्धा, उत्पादकता और नवाचार के मुद्दों का समाधान किए बिना, पाकिस्तान का विनिर्माण क्षेत्र गतिहीनता के जाल में फँसा रहेगा।
पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था केवल निवेश में गिरावट की समस्या से नहीं जूझ रही है। पिछले छह वर्षों में देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण और खनन क्षेत्र का योगदान लगभग 13.2 प्रतिशत पर स्थिर हो गया है।
कपड़ा, चमड़ा और इंजीनियरिंग सामान जैसे उद्योगों को भी बढ़ती लागत, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और असंगत सरकारी नीतियों के कारण वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने में संघर्ष करना पड़ रहा है। पाकिस्तान के विनिर्माण (एलएसएम) उत्पादन में वित्त वर्ष 2025 में 1.5 फीसदी की गिरावट आई, जबकि वित्त वर्ष 2024 में इसमें 0.92 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई थी।
अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि जहाँ ऊँची ब्याज दरों ने उधार लेने की क्षमता को कम कर दिया है, वहीं नीतिगत अनिश्चितता और निवेशकों में विश्वास की कमी ने समस्या को और गंभीर बना दिया है।
श्री आसिफ ने कहा कि यह मंदी केवल मौद्रिक सख्ती का नतीजा नहीं है, बल्कि विनिर्माण क्षेत्र में वर्षों से चली आ रही कमज़ोर वृद्धि और घटते लाभ का नतीजा है। उन्होंने एक व्यापक औद्योगिक पुनरुद्धार योजना की माँग करते हुए कहा, "जब उद्योगों को माँग, लाभ या स्थिरता नहीं दिखती, तो वे निवेश रोक देते हैं, यह इतनी सी बात है।"आर्थिक विश्लेषक डॉ. शाहिद सलीम ने कहा कि पाकिस्तान का औद्योगिक क्षेत्र आयात प्रतिबंधों और घटती घरेलू माँग की दबावों के बीच फँस गया है। उन्होंने कहा, "मुद्रा को स्थिर करने और चालू खाता घाटे को नियंत्रित करने की सरकार की कोशिश में औद्योगिक विकास अवरुद्ध हो गया है।" उन्होंने कहा कि जब कारखाने क्षमता से कम काम करते हैं, तो नौकरियाँ गायब हो जाती हैं और निर्यात गिर जाता है एवं कर संग्रह प्रभावित होता है। यह एक श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया होती है जो अर्थव्यवस्था के हर हिस्से को प्रभावित करती है।
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