उदयपुर , मई 27 -- राजस्थान के उदयपुर में रवींद्रनाथ टैगोर मेडिकल कॉलेज के नेफ्रोलॉजी विभाग ने संभाग के किडनी रोगियों के उपचार में पहली बार कॉन्टिनुअस एम्बुलेटरी पेरिटोनियल डायलिसिस (सीएपीडी) प्रक्रिया को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है।
इस पद्धति की शुरुआत से अब गंभीर किडनी मरीजों को डायलिसिस कराने के लिए बार-बार अस्पताल के चक्कर काटने और लंबी लाइनों में लगने की मजबूरी से पूरी तरह मुक्ति मिल जाएगी।
विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ पंकज बेनीवाल ने बुधवार को बताया कि सीएपीडी एक ऐसी उन्नत डायलिसिस पद्धति है, जिसे मरीज घर पर रहकर भी स्वयं या अपने परिजनों की मदद से कर सकता है। इस प्रक्रिया में मरीज के पेट में एक विशेष कैथेटर लगाया जाता है, जिसके माध्यम से डायलिसिस द्रव अंदर डाला जाता है। यह द्रव शरीर के भीतर मौजूद तमाम विषैले पदार्थों और अतिरिक्त पानी को सोखकर बाहर निकाल देता है। प्रशिक्षित होने के बाद मरीज बिना किसी अस्पताल की निर्भरता के, घर के सुरक्षित माहौल में अपनी सुविधानुसार इसे कर सकता है।
उन्होंने बताया कि यह तकनीक विशेष रूप से उन किडनी रोगियों के लिए जीवनदायिनी साबित होगी, जिनमें सामान्य हेमोडायलिसिस के दौरान ब्लड प्रेशर (रक्तचाप) बार-बार गंभीर स्तर तक गिर जाता है, जिनकी नसों में डायलिसिस के लिए एक्सेस बनाना बेहद कठिन या असंभव होता है। जो गंभीर हृदय रोग से ग्रसित हैं या जो सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं और डायलिसिस सेंटर तक नियमित नहीं पहुंच सकते।
नेफ्रोलॉजी विभाग में यह प्रक्रिया एक 21 वर्षीय क्रॉनिक किडनी डिजीज से पीड़ित युवती में सफलतापूर्वक की गयी। यह मरीज पिछले तीन महीनों से नियमित हेमोडायलिसिस पर थी, लेकिन डायलिसिस के दौरान उसका ब्लड प्रेशर लगातार अस्थिर हो रहा था और डायलिसिस एक्सेस की गंभीर समस्या आ रही थी।
आर.एन.टी. मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं नियंत्रक डॉ. राहुल जैन ने नेफ्रोलॉजी टीम को इस उपलब्धि पर बधाई देते हुए कहा कि इस सुविधा से विशेषकर ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों के उन गरीब मरीजों को संबल मिलेगा जो बार-बार शहर आकर डायलिसिस का खर्च और शारीरिक कष्ट उठाने को मजबूर थे।
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