चंडीगढ़ , दिसंबर 05 -- पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति के पत्नी से तलाक के मामले के विचाराधीन होने के बावजूद दूसरी शादी करने के लिए तीन महीने के साधारण कारावास की सज़ा सुनाई है।
गौरततलब है कि दंपति ने 2012 में शादी की थी, और 2020 में एक पारिवारिक अदालत के आदेश से तलाक भी हो गया था। लेकिन महिला ने तय सीमा के भीतर अपील दायर की, जिसके बाद एक खंडपीठ ने 13 अगस्त, 2020 को तलाक की डिक्री पर रोक लगा दी। इसके बावजूद, पति ने अपील की कार्यवाही में औपचारिक रूप से शामिल होने से पहले ही, जनवरी 2021 में दूसरी शादी कर ली।
न्यायमूर्ति अलका सरीन ने यह सज़ा महिला द्वारा दायर अवमानना याचिका पर सुनाते हुए 2,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।
न्यायालय ने कहा कि पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 का जानबूझकर उल्लंघन किया। यह धारा स्पष्ट रूप से वैधानिक अवधि के भीतर तलाक की डिक्री को चुनौती दिए जाने पर पुनर्विवाह को प्रतिबंधित करती है। न्यायाधीश ने पति की माफी को खारिज करते हुए इस बात पर जोर दिया कि स्थगन आदेश की अवहेलना करना और अपीलीय प्रक्रिया को कमजोर करना दीवानी अवमानना के समान है।
महिला का तर्क था कि पति के इस कदम से अदालत न्यायालय के अधिकार को सीधी चुनौती है। उसने आगे दलील दी कि पति के आचरण ने उसे सुलह के अवसर से वंचित कर दिया और उसकी अपील को अर्थहीन बना दिया। पति ने अपनी दूसरी शादी स्वीकार की, लेकिन दावा किया कि उसे अपील की सूचना नहीं मिली थी। न्यायालय ने इसे नहीं माना और कहा कि वह नोटिस तामील होने से बचने की कोशिश कर रहा था। उसने तयशुदा अवधि के दौरान अपील की स्थिति जानने का कोई प्रयास नहीं किया।
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