कोलकाता , मार्च 20 -- पश्चिम बंगाल में 294 सीटों वाले विधानसभा चुनाव में कुछ सीटें ऐसी हैं जिनके नतीजे आने वाले पांच वर्षों की सत्ता का रास्ता तय कर सकते हैं और सीटों में भवानीपुर , नंदीग्राम और संदेशखली प्रमुख हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा भवानीपुर की है, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है। तृणमूल कांग्रेस की मजबूत पकड़ वाली इस सीट पर इस बार मुकाबला और दिलचस्प हो गया है, क्योंकि विपक्ष के नेता शुवेंदु अधिकारी भी यहां से चुनाव लड़ रहे हैं। हालिया मतदाता सूची संशोधन और वोटर हटाए जाने के मुद्दे ने इस सीट पर अनिश्चितता बढ़ा दी है।

पूर्वी मिदनापुर की ग्रामीण सीट नंदीग्राम भी हाई-प्रोफाइल बनी हुई है। वर्ष 2021 में यहां शुबेंदु अधिकारी ने सुश्री बनर्जी को हराया था। इस बार श्री अधिकारी यहां से फिर मैदान में हैं और उनका मुकाबला उनके पूर्व सहयोगी पवित्र कर से है।

उत्तर 24 परगना की संदेशखाली सीट भी संवेदनशील मानी जा रही है, जहां महिला सुरक्षा और पिछले विवाद चुनावी मुद्दा बने हुए हैं।

वहीं भांगर सीट पर तृणमूल कांग्रेस नवसाद सिद्दीकी के नेतृत्व वाली इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) से कड़ी चुनौती मिल रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में यह सीट आईएसएफ के खाते में गई थी, जिससे इस बार मुकाबला और अहम हो गया है।

शहरी इलाकों में कोलकाता पोर्ट और बारुईपुर पश्चिम जैसी सीटें भी महत्वपूर्ण हैं। कोलकाता पोर्ट से फिरहाद हकीम तृणमूल कांग्रेस के मजबूत उम्मीदवार हैं, जबकि बारुईपुर पश्चिम में विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी लंबे समय से जीतते आ रहे हैं, लेकिन यहां विपक्ष का वोट शेयर बढ़ रहा है।

बालीगंज सीट भी इस बार चर्चा में है, जहां तृणमूल कांग्रेस के दिग्गज नेता सोवनदेब चट्टोपाध्याय लगातार 10वीं जीत की कोशिश में हैं और उनका मुकाबला भाजपा की नयी उम्मीदवार सतरूपा से है।

शुरुआती चरण में वोटिंग वाली खड़गपुर सदर सीट पर भाजपा के दिलीप घोष की वापसी मुकाबले को दिलचस्प बना रही है। वहीं तामलुक सीट अधिकारी परिवार के प्रभाव के कारण रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है , हालांकि इस बार श्री घोष मौजूदा भाजपा विधायक हिरन चटर्जी की जगह अपनी पुरानी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं।

दूसरी ओर तामलुक राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि यहां शक्तिशाली अधिकारी परिवार का प्रभाव है, इस परिवार ने पूर्वी मिदनापुर की राजनीति को आकार देने में एक अहम भूमिका निभाई है। नतीजतन, तामलुक में एक कड़े मुकाबले की उम्मीद है, जिसका परिणाम दोनों ही पक्षों के लिए प्रतीकात्मक और रणनीतिक महत्व रखेगा।

सीमा क्षेत्र की गायघाटा सीट पर मतुआ समुदाय का प्रभाव है, जहां नागरिकता और शरणार्थी मुद्दे चुनावी रुख तय कर सकते हैं। इसके अलावा समशेरगंज हालिया अशांति के कारण सुर्खियों में है।

उत्तर बंगाल की दिनहाटा सीट भी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला दिखा रही है, जहां अनुसूचित जनजाति मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित