मिदनापुर , जुलाई 11 -- देश के ज्ञात वनस्पति भूगोल का दायरा बढ़ाने वाली एक खोज में विद्यासागर विश्वविद्यालय और हावड़ा स्थित भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बीएसआई) के शोधकर्ताओं ने पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा ज़िले के शुष्क पर्णपाती जंगलों में दुर्लभ 'रावण पाम' की मौजूदगी दर्ज की है। पूर्वी भारत में इस प्रजाति के पाये जाने की यह पहली घटना है।
रावण पाम (जिसे अक्सर 'ट्रेवलर्स पाम' कहा जाता है) मेडागास्कर का एक पेड़ है जो केले के पत्तों जैसे बड़े पत्तों के साथ पंखे के आकार का मुकुट बनाता है। इसे 'डूम पाम' भी कहते हैं। यह भारत के गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगता है। यह दुनिया के उन चुनिंदा ताड़ के पेड़ों में से एक है जिनका तना दो समान शाखाओं में बंट जाता हैपीयर-रिव्यू जर्नल 'रीडिया' के ताज़ा अंक में प्रकाशित यह खोज, विलुप्त होने के कगार पर पहुँचने वाली श्रेणी के इस ताड़ के ज्ञात प्राकृतिक दायरे को काफ़ी बढ़ाती है। अब तक यह माना जाता था कि यह पेड़ सिर्फ़ भारत के पश्चिमी तटीय इलाक़ों जैसे गुजरात, गोवा, महाराष्ट्र और दीव में ही पाया जाता है। यह पश्चिम बंगाल के छोटानागपुर पठार क्षेत्र में बांकुड़ा के लक्ष्मी सागर के जंगलों में मिला है। विद्यासागर विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान और वानिकी विभाग के प्रोफ़ेसर अमल कुमार मंडल ने कहा कि यह खोज न केवल पूर्वी भारत की वनस्पतियों की विविधता को समृद्ध करती है, बल्कि भारत की सबसे अनोखी ताड़ प्रजातियों में से एक के ऐतिहासिक जैव-भूगोल और पारिस्थितिक लचीलेपन के बारे में दिलचस्प सवाल भी खड़े करती है।
'हाइफेन डाइकोटॉमा (एरेकेसी): पूर्वी भारत की वनस्पतियों की विविधता में एक नया नाम' शीर्षक वाला यह अध्ययन 'रीडिया' के वॉल्यूम 36(2), 2026 में छपा है। यह शोध विद्यासागर विश्वविद्यालय के रोनी साहा, राहुल देब बर्मन, डॉ. देवेंद्र सिंह, एस. चौधरी और प्रोफ़ेसर मंडल ने बीएसआई के वैज्ञानिकों के सहयोग से पूरा किया। इस खोज को जो बात ख़ास बनाती है, वह है ऐसे सबूतों का मिलना जिनसे पता चलता है कि बांकुड़ा में मौजूद ये पेड़ हाल ही में कहीं और से लाकर नहीं लगाए गए हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, बड़े पैमाने पर की गयी बीज की जांच, पारिस्थितिक निरीक्षण और एथनोबॉटैनिकल (पारंपरिक वनस्पति-संबंधी) सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि ये ताड़ के पेड़ या तो प्राकृतिक रूप से उगने वाले हैं या फिर एक सदी से भी ज़्यादा समय से यहाँ की प्रकृति में पूरी तरह घुल-मिल गए हैं। टीम ने फल देने वाले बड़े पेड़ों के साथ-साथ छोटे पौधे और प्राकृतिक रूप से उगने वाले नए पौधे भी देखे। ये इस बात के मज़बूत संकेत हैं कि यह आबादी अपने-आप पनपने वाली है, न कि कृत्रिम रूप से लगाई गयी है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित