सहारनपुर , अगस्त 27 -- उत्तर प्रदेश की सियासत में जातियों का प्रभाव और उनका राजनीतिक महत्व लंबे समय से अहम रहा है। सामाजिक न्याय, जातीय प्रतिनिधित्व और ओबीसी को राजनीतिक हिस्सेदारी दिए जाने की शुरुआत के साथ विभिन्न जातियों के बीच राजनीतिक वर्चस्व की होड़ भी बढ़ी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब जाटों के साथ-साथ गूर्जर बिरादरी का प्रभाव भी लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।
एक समय पश्चिम की गन्ना पट्टी में चौधरी चरण सिंह और चौधरी अजित सिंह की तूती बोलती थी और राजनीति तथा समाज में जाटों का वर्चस्व माना जाता था। जाटों के इस दबदबे के कारण अन्य पिछड़ी जातियों का उनके खिलाफ लामबंद होना शुरू हुआ। हरियाणा में जाटों को अलग रखकर राजनीति करने में भाजपा को सफलता मिली। इसके बाद राजस्थान, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी गूर्जरों के साथ सैनी, कश्यप, धीवर, कुम्हार-प्रजापति, हिंदू नाई और हिंदू धोबी जैसी जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और महत्व मिलने लगा।
जाटों के साथ गूर्जर भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की प्रमुख किसान बिरादरी हैं। जाट बिरादरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय से केंद्रित भूमिका में रही है और उसकी आबादी करीब 16 से 17 प्रतिशत बताई जाती है। वहीं गूर्जर बिरादरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलावा झांसी, बुंदेलखंड, इटावा और नोएडा समेत प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी फैली हुई है। गूर्जर बिरादरी की एक खासियत यह है कि उसके खिलाफ जाटों की तरह अन्य ओबीसी जातियों का व्यापक ध्रुवीकरण देखने को नहीं मिलता।
जाटों की अपनी राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय लोकदल रही है, जबकि गूर्जरों की कोई स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी नहीं है। जाटों में राजनीतिक एकजुटता की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है, जबकि गूर्जर किसी एक दल के साथ बंधे नहीं रहे। इसके बावजूद मौजूदा दौर में उन्हें राजनीतिक रूप से काफी लाभ मिलता दिख रहा है। लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल गूर्जर नेताओं को टिकट देने में रुचि दिखा रहे हैं, जिससे ओबीसी राजनीति में इस बिरादरी की मांग और प्रभाव बढ़ा है।
भाजपा के लिए यह सामाजिक समीकरण राजनीतिक रूप से खासा महत्वपूर्ण है। पार्टी को जाटों और गूर्जरों में किसी एक को चुनने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलने का अवसर मिल रहा है। इसके साथ ही भाजपा ओबीसी की अन्य छोटी जातियों को भी प्रतिनिधित्व देकर अपनी सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
सहारनपुर के प्रभावशाली गूर्जर नेता रहे चौधरी यशपाल सिंह के बेटे चौधरी रुद्रसेन समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। वहीं राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी ने बिजनौर के सांसद चंदन चौहान को पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी दी है। गूर्जर बिरादरी के चौधरी हुकुम सिंह कैराना संसदीय क्षेत्र से भाजपा सांसद और कई बार विधायक रह चुके हैं। वर्तमान में कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन भी गूर्जर बिरादरी से ताल्लुक रखती हैं।
भाजपा ने पहली बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश का क्षेत्रीय अध्यक्ष गूर्जर बिरादरी के नवाब सिंह नागर को बनाया है। इससे पहले पार्टी चौधरी भूपेंद्र सिंह को मेरठ क्षेत्र और बाद में उत्तर प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बना चुकी है। हालांकि, उनकी अगुवाई में 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की उत्तर प्रदेश में सीटें घटकर करीब आधी रह गई थीं।
भाजपा ने अब प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी पिछड़ी कुर्मी जाति से आने वाले पंकज चौधरी को दी है। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में मेरठ के युवा गूर्जर नेता चौधरी सत्येंद्र तोमर को पदोन्नत कर राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का दर्जा दिया है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति में गूर्जर नेताओं को मिल रही लगातार अहम जिम्मेदारियां इस बात का संकेत हैं कि आने वाले चुनावों में यह बिरादरी राजनीतिक दलों के लिए और महत्वपूर्ण हो सकती है। जाटों के पारंपरिक प्रभाव के बीच गूर्जरों का बढ़ता राजनीतिक प्रतिनिधित्व पश्चिम की बदलती सामाजिक और चुनावी तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।
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