ऋषिकेश (पौड़ी) , जनवरी 14 -- उत्तराखंड के ऋषिकेश में मकर संक्रांति के दिन परमार्थ निकेतन गंगा तट पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती साध्वी भगवती सरस्वती और विश्व के अनेक देशों से आये श्रद्धालुओं ने वैदिक मंत्रोपचार के साथ गंगा जी में डुबकी लगायी।
मकर संक्रान्ति भारतीय संस्कृति का एक अत्यंत पावन पर्व है, जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और उत्तरायण की शुभ शुरुआत का प्रतीक है। इस अवसर पर पवित्र नदियों में स्नान को विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रान्ति पर गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा एवं अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से पापों का क्षय होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। यह स्नान केवल शरीर की नहीं, बल्कि मन, विचार और संस्कारों की भी शुद्धि का माध्यम भी है। उत्तरायण काल को देवताओं का मार्ग कहा गया है, इसलिए इस समय किया गया स्नान, दान और जप विशेष फलदायी होता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि मकर संक्रान्ति का स्नान जीवन में नए संकल्प और नई ऊर्जा का आह्वान करता है। मकर संक्रान्ति के समय सूर्य की स्थिति और पृथ्वी के झुकाव में परिवर्तन से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ठंडे जल में स्नान करने से रक्तसंचार बेहतर होता है, प्रतिरक्षा प्रणाली सुदृढ़ होती है और शरीर में नवस्फूर्ति का संचार होता है। यही कारण है कि प्राचीन ऋषियों ने इस दिन स्नान को स्वास्थ्य और संतुलन से जोड़ा है।
उन्होंने कहा कि यह पर्व जीवन में परिवर्तन को पवित्रता और सकारात्मकता के साथ स्वीकार करने का संदेश देता है। सूर्य जब अपनी दिशा बदलता है, तो ऐसे समय हमें भी अपने जीवन की दिशा को प्रकाश, सेवा और सद्भाव की ओर मोड़ने का संकल्प लेना चाहिए।
स्वामी चिदानन्द ने कहा कि जीवन में जब दिशा बदलती है, तो उसे भय नहीं, बल्कि विश्वास, आनंद और कृतज्ञता के साथ स्वीकार करना चाहिए। जिस प्रकार सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण की ओर अग्रसर होता है, उसी प्रकार हम भी जीवन भी अंधकार से प्रकाश, जड़ता से जागृति और निराशा से नव आशा की ओर बढ़ने का संकल्प लें।
उन्हाेंने कहा कि सूर्य भारतीय संस्कृति में केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि जीवनदाता व ऊर्जा का स्रोत का प्रतीक है। मकर संक्रांति पर सूर्य का उत्तरायण होना इस बात का संकेत है कि अब प्रकाश की अवधि बढ़ेगी, उष्मा बढ़ेगी और प्रकृति नवजीवन की ओर बढ़ेगी।
स्वामी चिदानन्द ने कहा मकर संक्रांति का संदेश है बदलाव का स्वागत। जब ऋतुएँ बदलती हैं, तो हम उन्हें रोकते नहीं, बल्कि उनके साथ स्वयं को ढालते हैं। यही दर्शन जीवन में भी लागू होता है। परिवर्तन अनिवार्य है लेकिन उसका अनुभव हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। यदि हम उसे संघर्ष मानें, तो वह बोझ बन जाता है, यदि हम उसे उत्सव मानें, तो वही परिवर्तन हमें विकास की ओर ले जाता है।
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