पन्ना , मार्च 19 -- वन संपदा के मामले में अत्यधिक समृद्ध बुन्देलखण्ड क्षेत्र के मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में इन दिनों तेंदू फल की बहार है।

यहां के जंगलों में प्रचुरता से पाये जाने वाले तेंदू वृक्ष इस समय गोल आकार वाले पीले रंग के तेंदू फलों से लदे हुये हैं। गुणों से भरपूर तेंदू को आमतौर पर गरीबों का फल कहा जाता है। आदिवासी गर्मी के दिनों में घर से निकलने के पहले तेंदू के पके हुये फल जरूर खाते हैं ताकि गर्मी के प्रकोप से उनका बचाव हो सके।

आयुर्वेद चिकित्सकों का भी कहना है कि तेंदू का फल पौष्टिक होने के साथ-साथ पाचन के लिये भी बेहद उपयोगी है। तेंदू फल के सेवन से पेट साफ होता है तथा कब्जियत भी दूर होती है।

अमूमन तेंदू का पेड़ जंगलों में ही पाया जाता है। विन्ध्याचल की पहाडिय़ों में यह पेड़ बहुलता में मिलता है। वन व खनिज संपदा से समृद्ध पन्ना जिले के जंगलों में भी तेंदू के वृक्ष प्रचुरता में मिलते हैं। जिले के उत्तर व दक्षिण वन मण्डलों के अलावा पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर व बफर क्षेत्र के जंगल में भी बड़ी संख्या में तेंदू के पेड़ हैं जो गरीबों विशेषकर आदिवासियों की आय का प्रमुख स्रोत हैं। होली के बाद मार्च के महीने से लेकर मई तक आदिवासी जंगल से तेंदू फल का संग्रह कर बाजार में बेचते हैं, जिससे उन्हें नियमित आय होती है।

तेंदू फल खत्म होने के बाद इस वृक्ष में नई कोपलें निकल आती हैं, इन पत्तों का उपयोग बीड़ी बनाने में होता है। आमतौर पर 15 मई से 15 जून तक तेंदूपत्ता की तुड़ाई का कार्य चलता है, जिसका संग्रहण वन विभाग द्वारा कराया जाता है। तेंदूपत्ता तुड़ाई के कार्य से वनों के आस-पास रहने वाले आदिवासियों को इससे अच्छी खासी आय हो जाती है।

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