सहारनपुर , जनवरी 27 -- इस वर्ष के पद्म पुरस्कारों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पद्मश्री के प्रबल दावेदार माने जा रहे सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी के अंतरराष्ट्रीय कलाकार मोहम्मद असलम सैफी चयन से वंचित रह गए, जबकि मुरादाबाद के पीतल शिल्प पर नक्काशी के प्रसिद्ध कारीगर चिरंजी लाल यादव को भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुना है।

मोहम्मद असलम सैफी ने मंगलवार को बताया कि उन्हें पुरस्कार न मिलने का कोई मलाल नहीं है और वे वर्ष 2027 के लिए पुनः आवेदन करेंगे। उन्होंने कहा कि सहारनपुर की काष्ठ नक्काशी की परंपरा लगभग 400 वर्ष पुरानी है, जिसकी शुरुआत उनके पूर्वजों ने की थी। असलम सैफी अपने परिवार की पांचवीं पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं और उन्होंने यह कला अपने पिता, दादा और ताऊ से विरासत में सीखी है।

असलम सैफी ने बताया कि उन्हें जापान और फ्रांस में रहकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लकड़ी की नक्काशी का प्रशिक्षण मिला। उन्होंने न केवल स्वयं इस कला को निखारा, बल्कि भारत सहित विश्व के 26 देशों में हजारों कारीगरों को प्रशिक्षित कर काष्ठ शिल्प को जीवंत बनाए रखा है। इसके बावजूद सहारनपुर के इतिहास में अब तक किसी भी काष्ठ कलाकार को पद्म पुरस्कार नहीं मिल सका है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2024 में भी मुरादाबाद के पीतल शिल्प कारीगर बाबूराम यादव को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था, जबकि उसी वर्ष लकड़ी की नक्काशी के लिए कश्मीर के गुलाम नबी को पुरस्कार मिला था। इस बार भी पद्मश्री का चयन पीतल नगरी मुरादाबाद के पक्ष में गया, जिससे सहारनपुर के काष्ठ शिल्प प्रेमियों में निराशा देखी गई।

अब तक सहारनपुर से चार व्यक्तियों को पद्मश्री पुरस्कार मिल चुका है, जिनमें प्रसिद्ध चिकित्सक रामनारायण बागले, साहित्यकार एवं स्वतंत्रता सेनानी पंडित कन्हैया लाल मिश्र, योगाचार्य भारत भूषण और कृषि वैज्ञानिक चौधरी सेठपाल सिंह शामिल हैं। स्थानीय कला जगत का मानना है कि यदि सहारनपुर की लकड़ी की नक्काशी को पद्मश्री से सम्मानित किया जाता, तो यह इस विश्वविख्यात कला के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि होती।

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