पटना, दिसंबर 13 -- बिहार के लखीसराय में स्थित लाल पहाड़ी के अवशेषों की खुदाई के बाद सामने आये दुनिया के पहले बौद्ध महिला विहार पर लिखी पत्रकार और लेखक रमाकांत 'चंदन' की अदभुत पुस्तक 'लाल पहाड़ी: स्त्री महाविहार' का लोकार्पण शनिवार को पटना पुस्तक मेले में हुआ।
कार्यक्रम के दौरान मुख्य वक्ता के रूप में पटना विश्वविद्यालय इतिहास विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो भारती एस. कुमार ने कहा कि इस पुस्तक ने इतिहास के विद्यार्थियों को जिम्मेदारी दी है कि अपने शोध कार्य से स्त्री विहार की संभावना को साक्ष्यों की कसौटी पर कसें।
कार्यक्रम के अध्यक्ष पूर्व चेयरमैन वाटर रिसोर्स सोसाइटी प्रो. संतोष कुमार ने रमाकांत चंदन को उनकी शोधपरक पुस्तक के लिए बधाई दी।
श्री चंदन की इस पुस्तक के केंद्र में लखीसराय स्थित लाल पहाड़ी एक ऐसा स्थल है, जो न केवल पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि बौद्ध धर्म के सामाजिक विस्तार, स्थापत्य कला और स्त्री सहभागिता की दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है। इस स्थान के बारे में लम्बे समय तक कोई जानकारी उपलब्ध नही थी, लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के निर्देश पर हुई खुदाई ने इस तरफ इतिहासकारों और पुरातत्व वेताओं का ध्यान खिंचा और उन्हें प्रेरित किया कि इस कौतुहल का जवाब ढूंढे।
पुस्तक के लेखक श्री चंदन ने कहा कि लाल पहाड़ी से प्राप्त अवशेष, मूर्तियाँ, मुहरें, जले हुए पत्थर, जल निकासी संरचनाएं, चूड़ियाँ, और स्त्री-श्रृंगार के विविध रूप एक समृद्ध स्त्री बौद्ध विहार की और इशारा करते हैं। यह स्थान केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि स्त्री भिक्षुणियों के लिए सुरक्षित एवं सुनियोजित आवासीय परिसर भी प्रतीत होता है, जहाँ से पाल राजवंश से संबंधित दान पत्रों की पुष्टि भी प्राप्त होती है। सबसे खास बात है कि इसकी सुरक्षा बारह बुर्जों के माध्यम से की गई थी, जो सवाल करते हैं कि स्त्रियों के लिए ये खास सुरक्षित विहार क्यों बना हुआ था। लखीसराय के आसपास उन दिनों बौद्ध तथा शैव के बीच संघर्ष के उदाहरण मिलते हैं, बौद्ध उनसे डर गये या उन्हें बख्तियार खिलजी जैसे मुस्लिम आक्रान्ताओं का डर सता रहा था। पुस्तक इस सभी सवालों को तलाशने की कोशिश करती है।
लेखक ने कहा कि प्रसिद्ध इतिहासकारों एवं पुरातत्ववेत्ताओं जैसे कि एलेक्जेंडर कनिंघम, एफ. एम. एशर, डी. सी. सिरकार, और हाल के वर्षों में अनिल कुमार ने सक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि यह स्थल न केवल धार्मिक गतिविधियों का केंद्र था, बल्कि आक्रांताओं और सांस्कृतिक संक्रमणों से बचाव का भी स्थल था।
उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक केवल ऐतिहासिक या स्थापत्य पक्षों को नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, स्त्री-सम्बद्ध धार्मिक व्यवहार, भिक्षुणियों की गतिविधियों, और तत्कालीन राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को भी समानान्तर रूप से विश्लेषित किया गया है। इस हिसाब से यह न केवल शोधकर्ताओं के लिए, बल्कि आम पाठकों को भी बहुत कुछ समझने का अवसर देती है।
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