अमृतसर , मार्च 27 -- पंजाब सरकार द्वारा प्रस्तावित "पंजाब धार्मिक ग्रंथ अपराध रोकथाम विधेयक 2025" की समीक्षा के लिए शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) द्वारा गठित 15 सदस्यीय उच्च स्तरीय उप-समिति की बैठक शुक्रवार को चंडीगढ़ स्थित उप-कार्यालय में हुई। इस बैठक की अध्यक्षता सेवानिवृत्त जस्टिस मोहिंदर मोहन सिंह बेदी ने की।
बैठक के बाद न्यायमूर्ति बेदी ने बताया कि 22 मार्च को मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा दिया गया बयान बेहद भ्रमित करने वाला है। मुख्यमंत्री जिस "द जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार एक्ट 2008" में संशोधन की बात कर रहे हैं, वह केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की छपाई, प्रकाशन और वितरण से संबंधित है।जबकि 2025 का प्रस्तावित विधेयक सभी धर्मों के पवित्र ग्रंथों की बेअदबी से संबंधित है। समिति का मानना है कि सरकार दोनों को मिलाकर जनता में भ्रम पैदा कर रही है।
समिति ने आरोप लगाया कि पंजाब सरकार और विधानसभा की सेलेक्ट कमेटी जानबूझकर एसजीपीसी के साथ जानकारी साझा नहीं कर रही है।एसजीपीसी ने 2016 और 2018 में पारित पुराने बिलों की कमियों और केंद्र सरकार द्वारा उन पर उठाए गए ऐतराजों की जानकारी मांगी थी, ताकि नए सुझाव दिए जा सकें। लेकिन सरकार ने अब तक कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया है।
समिति ने यह भी बताया कि विधेयक का पंजाबी अनुवाद बेहद त्रुटिपूर्ण है, जिसका कानूनी रूप से गलत फायदा उठाया जा सकता है। एसजीपीसी सिखों की प्रतिनिधि संस्था है, फिर भी सरकार ने प्रस्तावित संशोधनों के मसौदे पर उनसे कोई सलाह नहीं ली। समिति का मानना है कि भारत एक विविधतापूर्ण समाज है जहाँ हर धर्म की अपनी मान्यताएं और दर्शन हैं। इसलिए, बिना गहन अध्ययन और पुराने ऐतराजों को समझे बिना नए सुझाव देना संभव नहीं है।
एसजीपीसी ने कहा कि जानकारी न देना यह दर्शाता है कि सरकार द्वारा सुझाव मांगना केवल एक 'दिखावा' है।
सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति मोहिंदर मोहन सिंह बेदी के साथ सीनियर एडवोकेट पूरन सिंह हुंदल, एडवोकेट बलतेज सिंह ढिल्लों, केहर सिंह, डॉ. परमवीर सिंह, एडवोकेट भगवंत सिंह सियालका और अन्य कानूनी विशेषज्ञ शामिल थे।
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