बेंगलुरु , मई 31 -- कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में श्री डीके शिवकुमार के कार्यभार संभालने की तैयारियों के बीच कांग्रेस खुद को एक ऐसे सवाल के सामने खड़ा पा रही है, जो पंजाब में पार्टी के पतन की याद दिलाता है। पंजाब में नवजोत सिंह सिद्धू के उभार के साथ ही नेतृत्व का कड़ा संघर्ष शुरू हुआ था, जिसने पार्टी को कमजोर कर दिया और उसके बाद पार्टी को चुनाव में हार मिली थी।

कर्नाटक में 'सिद्दू' के नाम से लोकप्रिय निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के मामले में पार्टी नेतृत्व उम्मीद कर रहा होगा कि इतिहास खुद को न दोहराये। कांग्रेस ने श्री शिवकुमार को मनोनीत मुख्यमंत्री घोषित कर कर्नाटक में लंबे समय से चले आ रहे नेतृत्व के सवाल को भले ही सुलझा लिया हो, लेकिन अधिक कठिन चुनौती की शुरुआत शायद अब हो रही है और दांव पर बहुत कुछ लगा हुआ है। कर्नाटक दक्षिण भारत में कांग्रेस का सबसे महत्वपूर्ण राज्य और उन चुनिंदा बड़े राज्यों में से एक बना हुआ है, जहां वह अपने दम पर शासन कर रही है। श्री सिद्दारमैया और श्री शिवकुमार के बीच एकता बनाये रखना आखिरकार उतना ही महत्वपूर्ण साबित हो सकता है, जितना कि खुद यह नेतृत्व परिवर्तन है।

तीन साल तक पद पर रहने के बाद श्री सिद्दारमैया के इस्तीफा देने और श्री शिवकुमार के कमान संभालने की तैयारी के बीच पार्टी एक परिचित दुविधा का सामना कर रही है। एक ऐसे शक्तिशाली निवर्तमान नेता को कैसे संभाला जाये, जिसका एक बड़ा राजनीतिक आधार अब भी बना हुआ है। इस स्थिति के कारण पंजाब के साथ तुलना शुरू हो गयी है, जहां श्री अमरिंदर सिंह और श्री नवजोत सिंह सिद्धू के बीच सत्ता संघर्ष को कांग्रेस नेतृत्व के संभालने के तरीके के बाद हाल के वर्षों में पार्टी को सबसे नुकसानदेह चुनावी हार का सामना करना पड़ा था। कर्नाटक में हालांकि परिस्थितियां काफी अलग हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसमें एक साझा सूत्र देखते हैं। वह जोखिम जो तब पैदा होते हैं जब नेतृत्व परिवर्तन में बड़ा रसूख रखने वाले मजबूत क्षेत्रीय क्षत्रप शामिल हों।

पंजाब में श्री अमरिंदर सिंह ने 2017 में कांग्रेस को विधानसभा में आसान जीत दिलायी थी और वे पार्टी के मुख्य वोट दिलाने वाले नेता बने रहे। एक प्रतिस्पर्धी सत्ता केंद्र के रूप में श्री नवजोत सिंह सिद्धू के उभार ने राज्य इकाई को धीरे-धीरे अस्थिर कर दिया। सार्वजनिक मतभेद बढ़ते-बढ़ते खुले टकराव में बदल गया, जिसका अंत 2021 में श्री अमरिंदर के इस्तीफे के साथ हुआ। यह बदलाव पार्टी को पुनर्जीवित करने में विफल रहा। इसके बजाय कांग्रेस 2022 के चुनावों में विभाजित और हतोत्साहित होकर उतरी, जिससे आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत का रास्ता साफ हो गया।

कर्नाटक के नेतृत्व परिवर्तन में अलग राजनीतिक वास्तविकताएं शामिल हैं, लेकिन यहां भी सवाल वही है। श्री सिद्दारमैया केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं हैं। पिछले एक दशक में, वे कर्नाटक में कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली जननेता के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण मतदाताओं के बीच अपना आधार बनाया है। 2023 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को निर्णायक जनादेश दिलाने में मदद करने का व्यापक श्रेय उनके नेतृत्व को दिया गया था। पद छोड़ने के बाद भी सिद्दारमैया राज्य कांग्रेस में सबसे शक्तिशाली चेहरों में से एक बने हुए हैं। दूसरी ओर श्री शिवकुमार पार्टी के संगठनात्मक ढांचे की रीढ़ माने जाते हैं। कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने लगातार राजनीतिक झटकों के बाद पार्टी को फिर से खड़ा करने में अहम भूमिका निभायी है और उन्हें राज्य में कांग्रेस की चुनावी मशीनरी का मुख्य सूत्रधार माना जाता है।इन दोनों सत्ता केंद्रों का सह-अस्तित्व सालों से कर्नाटक कांग्रेस की राजनीति की पहचान रहा है।

अब तक यह संतुलन बेहद सावधानी से तैयार की गयी व्यवस्था के तहत बना हुआ था, जिसमें श्री सिद्दारमैया सरकार का नेतृत्व कर रहे थे और श्री शिवकुमार संगठन के भीतर अपना बड़ा प्रभाव बनाये हुए थे। अब श्री शिवकुमार के शीर्ष पद पर आने के साथ ही यह समीकरण एक नये दौर में प्रवेश कर रहा है।

कांग्रेस नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इस नेतृत्व परिवर्तन को सहज और आम सहमति से हुआ दिखाया है। फिर भी, राजनीतिक चुनौती केवल शपथ ग्रहण समारोह तक सीमित नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या श्री सिद्दारमैया के समर्थक नये मुख्यमंत्री के पीछे पूरी तरह लामबंद हो जायेंगे या पार्टी के भीतर बंटी हुई वफादारियां शासन और संगठन में टकराव की स्थिति पैदा करेंगी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के पास आंतरिक अस्थिरता के लिए बहुत कम गुंजाइश है। कर्नाटक दक्षिण भारत में पार्टी का सबसे मजबूत गढ़ है और उन चुनिंदा बड़े राज्यों में से एक है, जहां वह इस समय अपने दम पर सत्ता में है। कोई भी लंबा चलने वाला गुटीय संघर्ष आने वाले चुनावी मुकाबलों से पहले उसकी स्थिति को कमजोर कर सकता है। इसी संदर्भ में पंजाब के साथ की जा रही तुलना सुर्खियां बटोर रही है। यह समानता खुद श्री सिद्दारमैया को लेकर कम है, बल्कि उस व्यापक सबक के बारे में ज़्यादा है, जो कांग्रेस ने अमरिंदर-सिद्धू प्रकरण से सीखा या नहीं सीख पायी। एक मुख्यमंत्री को बदलना शायद आसान हो सकता है, लेकिन उसके बाद के राजनीतिक परिणामों को संभालना कहीं ज्यादा मुश्किल होता है।

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