नैनीताल , अक्टूबर 13 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने आभूषण कारोबार से जुड़े ट्रेडमार्क विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए 'स्वर्णिका' ट्रेडमार्क के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगा दी है।
अदालत ने माना कि 'सुनरेका' और 'स्वर्णिका' नामों में समानता के कारण ग्राहकों के बीच भ्रम की आशंका है।
न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ ने निचली अदालत के आदेश को निरस्त करते हुए अपील स्वीकार कर ली। यह रोक दीवानी मुकदमे के निस्तारण तक प्रभावी रहेगी। अदालत ने इस मामले में गत सात अक्टूबर को सुनवाई की लेकिन आदेश की प्रति आज उपलब्ध हुई।
यह मामला ऊधमसिंह नगर जिले में आभूषण कारोबार करने वाले दीपांशु बंसल और पूनम भट्ट के बीच ट्रेडमार्क के इस्तेमाल को लेकर है। दीपांशु बंसल ने सुनरेका नाम से ट्रेडमार्क पंजीकरण के लिए 09 सितंबर 2022 को आवेदन किया था, जिसे 28 जुलाई 2023 को मंजूरी मिली। उनका आरोप है कि पूनम भट्ट स्वर्णिका नाम से सोने-चांदी के आभूषणों का कारोबार कर उनके पंजीकृत ट्रेडमार्क से मिलता-जुलता नाम इस्तेमाल कर रही हैं, जिससे ग्राहकों के भ्रमित होने की आशंका है।
इस विवाद में दीपांशु बंसल ने ऊधमसिंह नगर के प्रथम अपर जिला न्यायाधीश की अदालत में अस्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी। निचली अदालत ने 18 जुलाई 2026 को उनकी अर्जी खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ उन्होंने उच्च न्यायालय में अपील दायर की।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि ट्रेडमार्क की समानता तय करते समय नामों को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर नहीं, बल्कि समग्र रूप से देखा जाना चाहिए। आम ग्राहक दोनों ट्रेडमार्क को एक साथ रखकर तुलना नहीं करता बल्कि अपनी स्मृति और सामान्य धारणा के आधार पर उत्पाद की पहचान करता है। ऐसे में दोनों नामों के बीच समानता से भ्रम पैदा होने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी गौर किया कि दोनों पक्षों की दुकानें एक ही सड़क पर 500 मीटर से कम दूरी पर स्थित हैं और दोनों का कारोबार आभूषणों से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, प्रतिवादी ने जून 2023 के आसपास सोने के आभूषणों का कारोबार शुरू किया था, जबकि अपीलकर्ता ने सितंबर 2022 में अपने ट्रेडमार्क के पंजीकरण के लिए आवेदन किया था।
अदालत ने माना कि अपीलकर्ता प्रथम दृष्टया अपना मामला साबित करने में सफल रहा है। साथ ही सुविधा का संतुलन भी उसके पक्ष में है और ट्रेडमार्क के कथित उल्लंघन से उसे अपूरणीय नुकसान हो सकता है। इन्हीं आधारों पर अदालत ने निचली अदालत के आदेश को गलत ठहराते हुए निरस्त कर दिया।
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