अहमदाबाद , अक्टूबर 15 -- मुश्किल नौकारियों, पारिवारिक जिम्मेदारियों और अपने जीवन के कठिन दौर के बीच 'अडानी अहमदाबाद मैराथन' के अब तक हुए सभी नौ संस्करणों में हिस्सा लेने वाले 25 धावकों के समूह को 'अडानी स्पोर्ट्सलाइन' सम्मानित करेगा।
अब जब मैराथन अपने 10वें संस्करण की ओर बढ़ रही है, इनमें 25 धावकों में से तीन धावकों ने बताया कि आखिर क्या चीज़ उन्हें बार-बार यहाँ वापस लाती है। फ्रीलांस कंटेंट राइटर शिनी नायर, जो अपना समय अहमदाबाद और सिंगापुर के बीच बाँटती हैं, उनके लिए दौड़ना कभी कोई योजना नहीं थी। उन्होंने पहली मैराथन में लगभग अनजाने में ही हिस्सा लिया था, जब उनके पति ने परिवार के साथ बाहर घूमने के बहाने उनका और उनके छोटे बेटे का 5के रेस के लिए रजिस्ट्रेशन करा दिया था। यह एक ऐसी सालाना परंपरा बन गई, जिसका वे सभी बेसब्री से इंतज़ार करते थे।
2022 में, एक बाइक दुर्घटना में उन्होंने अपने बेटे को खो दिया। उनकी एक साथ दौड़ी गई आखिरी रेस 10के की थी, और तब से हर साल मैराथन में वे उसी दूरी को दौड़ती आ रही हैं।
उन्होंने कहा, "यह एक ऐसी रेस है जिसे मैं कभी नहीं छोड़ूंगी। हमने एक परिवार के तौर पर, बस यूं ही अचानक इसकी शुरुआत की थी, और फिर यह एक ऐसी परंपरा बन गई जिसे हमने हर साल बिना चूके निभाया। उनके (पिताजी के) गुजर जाने के बाद, 10के दौड़ना मेरे लिए सिर्फ एक दूरी तय करना नहीं, बल्कि उनकी यादों के करीब बने रहने का एक जरिया बन गया। तब से मेरी दौड़ने की प्रक्रिया कभी नियमित रही तो कभी नहीं। कुछ साल मैंने अच्छे से अभ्यास किया, तो कुछ साल मैं शायद ही दौड़ पायी, लेकिन यह स्पर्धा कुछ अलग है। रेस से पहले मेरी शारीरिक स्थिति कैसी भी हो, मैं हमेशा इसमें हिस्सा लेती हूँ। 2024 में मुझे बहुत तेज दस्त हो गए थे और रेस के दिन मैं पानी तक नहीं पी पा रहा थी, फिर भी मैंने दौड़ पूरी की। इसे छोड़ देने का खयाल भी मेरे मन में कभी नहीं आया।"गोपीनाथ धंडापानी की दौड़ने की कहानी किसी फिनिश लाइन से नहीं, बल्कि एक 'वेक-अप कॉल' (चेतावनी) से शुरू हुई। चौदह साल पहले, जब उनका वजन 90 किलो था और वे 40 इंच की पैंट पहनते थे, तब उन्होंने अपने पिता को हार्ट अटैक से गुजरते देखा-जिसमें डायबिटीज ने स्थिति और बिगाड़ दी थी। उसी दौरान उनकी माँ की तबीयत भी खराब रहने लगी और उनके भाई-बहनों को भी डायबिटीज होने लगी। उन्होंने अपनी जीवनशैली बदलने का फैसला किया, और दौड़ना ही वह जरिया बना जिससे उन्होंने यह बदलाव किया। गोपीनाथ अपने कार्यस्थल पर 'हेड ऑफ सेल्स' हैं, लेकिन साथ ही वे एक सर्टिफाइड रनिंग कोच भी बन गए हैं। 2017 में, वे इस मैराथन के शुरुआती पाँच एंबेसडरों में से एक थे, और तब से यह रेस उनके लिए और भी ज्यादा मायने रखने लगी है।
उन्होंने कहा, "जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ कि मैंने कहाँ से शुरुआत की थी - तब मैं अस्वस्थ था, मेरा वज़न ज़्यादा था, और मेरा परिवार उन्हीं बीमारियों से जूझ रहा था जिनकी वजह से मेरे पिता का निधन हो गया था - तो मुझे लगता है कि दौड़ने ने ही मुझे बचाया है। जब मैंने महसूस किया कि इसने मेरे लिए क्या किया है, मैं चाहता था कि दूसरे लोग भी इसे महसूस करें। इसीलिए मैंने कोचिंग देना शुरू किया। यह मैराथन मेरी इस यात्रा का शुरुआत से ही हिस्सा रही है। मैंने इसे एक छोटी सी स्थानीय दौड़ से बढ़कर एक ऐसे आयोजन के रूप में विकसित होते देखा है, जिसके इर्द-गिर्द पूरा शहर अपने साल की योजना बनाता है। मैं यहाँ बार-बार इसलिए आता हूँ क्योंकि रजिस्ट्रेशन फ़ीस का एक हिस्सा सेना को जाता है। मेरे कई दोस्त सेना में रहे हैं और उन्होंने मुझे बताया है कि उन्हें अपनी ज़िंदगी में कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है। हर साल इस दौड़ में हिस्सा लेना, उनके प्रति अपना आभार जताने का एक छोटा सा तरीक़ा है।"डेलॉइट में मैनेजर, आन गोडियावाला हमेशा फ़ुटबॉल और जिम के ज़रिए फ़िट रहते थे, लेकिन 2023 से पहले तक वे कभी-कभार ही दौड़ते थे। उस साल, उन्होंने लगातार 365 दिनों तक रोज़ दौड़ने का फ़ैसला किया-चाहे काम के सिलसिले में यात्रा करनी पड़े, शादियों या त्योहारों में जाना पड़े, या ज़िंदगी में कोई भी अन्य चुनौती सामने आए।
उन्होंने बताया, "कई दिन ऐसे भी आए जब मेरा बिल्कुल भी दौड़ने का मन नहीं था। काम के लिए लगातार यात्राएं, शादियां, छुट्टियां, त्योहार, यहां तक कि बारिश भी-एक बार जब मैंने लगातार दौड़ने का संकल्प ले लिया, तो इनमें से कोई भी चीज़ बहाना नहीं बन सकी। जल्द ही, यह केवल दौड़ने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह इस बात का टेस्ट बन गया कि क्या मैं तब भी अनुशासित रह सकता हूं, जब हालात बिल्कुल भी अनुकूल न हों। यह सोच तब से मेरे साथ बनी हुई है-चाहे काम की जगह हो या उसके बाहर।" इसी निरंतरता की बदौलत 2024 में उन्होंने अपनी पहली फ़ुल मैराथन पूरी की और बाद में एक सर्टिफ़ाइड मैराथन ट्रेनर कोर्स भी किया, ताकि वे समझ सकें कि उन्होंने अपने शरीर को जिस प्रक्रिया से गुज़ारा है, उसके पीछे का विज्ञान क्या है। अहमदाबाद मैराथन से उनका जुड़ाव और भी पुराना है: इसके पहले संस्करण में उन्होंने अपनी पहली हाफ़ मैराथन दौड़ी थी। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उनके पिता जीवन भर दौड़ते रहे थे। उन्होंने कहा कि हर साल इस दौड़ में वापस आना किसी पुनर्मिलन जैसा लगता है।
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