नयी दिल्ली , मई 05 -- दिल्ली की एक अदालत ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के एक अधिकारी की गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल से जुड़े कथित रिश्वत मामले में जमानत मंजूर कर ली है।
अदालत ने कहा कि मामले की महत्वपूर्ण जांच पूरी हो चुकी है और आरोपी संतोष कुमार जैन को सलाखों के पीछे रखने से कोई ठोस उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
अदालत ने गौर किया कि आरोपी लगभग एक महीने से न्यायिक हिरासत में था और उसने जांच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग किया है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी ने अपनी आवाज का नमूना दे दिया है और उसके मोबाइल फोन सहित इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड पहले ही जब्त किये जा चुके हैं।
अदालत ने राहत देते हुए आरोपी को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही शर्त रखी कि वह गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे और बिना अनुमति के देश नहीं छोड़ेंगे।
आवेदक की ओर से पेश बचाव पक्ष के वकील संदीप शर्मा और सचिन बैसला ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को गलत तरीके से फंसाया गया है और शिकायतकर्ता उनसे रंजिश रखते थे। उन्होंने दावा किया कि आरोपी ने न तो रिश्वत मांगी और न ही स्वीकार की, बल्कि कथित राशि उनके पास रख दी गयी थी। उन्होंने यह भी कहा कि जांच काफी हद तक पूरी हो चुकी है और यह मामला उस श्रेणी में आता है जहां अदालतों को आरोपी के पक्ष में विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।
वकीलों ने यह भी बताया कि गिरफ्तारी के समय नयी दंड संहिता के तहत कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था और आरोपी एक सरकारी कर्मचारी है, जिसके समाज में गहरे जुड़ाव हैं, इसलिए उनके भागने का कोई खतरा नहीं है।
वरिष्ठ लोक अभियोजक हरि मोहन के माध्यम से केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि आरोपी को 1.60 लाख रुपये की रिश्वत मांगते और लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया था। अभियोजन पक्ष ने कहा कि सह-आरोपी को की गयी एक कॉल से साजिश की पुष्टि हुई है और बीमा कंपनी के महत्वपूर्ण गवाहों से अभी पूछताछ होनी बाकी है। एजेंसी ने आशंका जताई कि रिहा होने पर आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकता है या सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता है।
विशेष न्यायाधीश गगनदीप सिंह की अध्यक्षता वाली अदालत ने इन चिंताओं को खारिज कर दिया। न्यायाधीश ने कहा कि शिकायतकर्ता और स्वतंत्र गवाहों से पहले ही पूछताछ की जा चुकी है। अदालत ने आदेश में कहा कि अधिकारियों को प्रभावित करने की संभावना को आरोपी पर उचित शर्तें लगाकर नियंत्रित किया जा सकता है। अदालत ने यह भी नोट किया कि जांच एजेंसी ने आरोपी की और हिरासत की मांग नहीं की है।
यह मामला गुरुग्राम के मानेसर स्थित सिल्वर स्ट्रीक अस्पताल में बीमा कंपनी द्वारा किये गये निरीक्षण से जुड़ा है, जिसके बाद अस्पताल की नगदी रहित उपचार सुविधा अस्थायी रूप से रोक दी गयी थी। अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने अनुकूल रिपोर्ट के लिए रिश्वत की मांग की थी। सीबीआई द्वारा बिछाये गये जाल के बाद आरोपी को एक सह-आरोपी के साथ गिरफ्तार किया गया था।
अदालत ने निर्देश दिया है कि मामले के लंबित रहने के दौरान आरोपी बीमा कंपनी या तीसरे पक्ष के प्रशासकों से जुड़े किसी भी अधिकारी से संपर्क नहीं करेगा।
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