पटना , अक्टूबर 29 -- बिहार विधान परिषद की पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की सीट पर जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के नीरज कुमार ने लगातार चौथी बार जीत दर्ज कर अपना कब्जा बरकरार रखा है और उनकी इस जीत से पार्टी तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने राहत की सांस ली है।

इस चुनाव में नीरज कुमार के सामने विपक्षी उम्मीदवारों के साथ-साथ अपनी ही पार्टी के विधायक अनंत सिंह के विरोध की चुनौती भी थी। अनंत सिंह का मोकामा तथा बाढ़ के आसपास के क्षेत्रों में गहरा प्रभाव है और उनकी छवि जनतादल यूनाइटेड (जदयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के पूर्वमुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हनुमान के रूप में रही है। इस चुनाव में श्री सिंह ने नीरज कुमार के खिलाफ जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी अनुज सिंह के पक्ष में प्रचार किया था। इसके बावजूद नीरज कुमार की जीत ने राजग और जदयू की साख पर बट्टा लगने से नही दिया।

पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव इस बार बिहार विधान परिषद की सबसे चर्चित संघर्ष माना गया। नीरज कुमार पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और प्रमुख प्रवक्ताओं में शामिल हैं। ऐसे में उनकी हार पार्टी को एक दीर्घकालिक राजनीतिक झटका दे सकती थी। वहीं, अनंत सिंह के विरोध को विपक्ष आने पक्ष में भुनाने में जुटा हुआ था। इस चुनाव को जदयू के भीतर की खींचतान से जोड़ दिया गया था।

बिहार विधान परिषद की आठ सीटों में चुनाव पूर्व बंटवारे के समय चार-चार जदयू तथा भाजपा के हिस्से में आई थीं। भाजपा ने अपने हिस्से में आई चार में से तीन पर जीत दर्ज कर बेहतर प्रदर्शन किया, वहीं जदयू सिर्फ पटना स्नातक क्षेत्र में ही जीत दर्ज कर पाई। इस क्षेत्र में मतगणना के बाद नीरज कुमार को 19,930 मत मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी राजद के दिलीप कुमार को 15,275 मत प्राप्त हुए। इस तरह नीरज कुमार ने 4,655 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार अनुज सिंह 11,278 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। इस परिणाम ने स्पष्ट कर दिया कि अनंत सिंह के विरोध के बावजूद नीरज कुमार अपनी साख और सीट दोनो बचाने में सफल रहे।

चुनाव के दौरान अनंत सिंह की भूमिका ने राजनीतिक हलकों में खासा ध्यान खींचा। अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ दूसरे प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार करने से जदयू के अंदर मतभेद खुलकर सामने आए। चुनाव के बाद जदयू ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। इस कार्रवाई ने चुनावी मुकाबले को संगठनात्मक अनुशासन के सवाल से भी जोड़ दिया।

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