कोलकाता , अक्टूबर 13 -- पूरी दुनिया में बंगाली समुदाय के लोग जहां-जहां रहते हैं, वहां-वहां दुर्गा पूजा का आयोजन पूरी आस्था और उमंग से किया जाता है।

इस सिलसिले में नीदरलैंड के एमस्टेलवीन में रहने वाला बंगाली समुदाय 'हॉलैंड-ए-होइचोई' संगठन के ज़रिए पिछले एक दशक से दुर्गा पूजा की समृद्ध परंपराओं को पूरी भव्यता के साथ सहेज कर रखे हुए है। लंदन के गनर्सबरी पार्क स्पोर्ट्स हब में इस साल होने वाली दुर्गा पूजा में 'ढाक' (पारंपरिक ढोल) की थाप, चंदननगर की शानदार रोशनी और सबसे खास बात, बंगाल की रेडियो विरासत की पुरानी यादें देखने को मिलेंगी।

एमस्टेलवीन में बंगाली समुदाय की यह समिति वर्ष 2026 में अपनी 10वीं वर्षगांठ मना रही है। गौरतलब है कि लगभग दस साल पहले राजधानी एम्स्टर्डम से करीब 10 किलोमीटर दूर रहने वाले समुदाय के लोग दुर्गा पूजा मनाने के लिए एक साथ आए थे। चाय पर बंगालियों की एक अनौपचारिक मुलाकात के दौरान 'हॉलैंड-ए-होइचोई' नाम से शुरू हुई यह पहल अब एमस्टेलवीन के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले समुदाय के लोगों के लिए एक बड़े उत्सव का रूप ले चुकी है।

संगठन की कोर कमेटी के वरिष्ठ सदस्य सैकत मित्रा ने कहा, "2017 से 'हॉलैंड-ए-होइचोई' न केवल उत्सव की एक कहानी बन गया है बल्कि यूरोप की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में समुदाय के लोगों को एक साथ लाने और आपस में जोड़ने का एक बड़ा ज़रिया भी बन गया है। इसने हमें एक अलग परिवेश और विदेशी धरती पर भी अपनी गहरी जड़ों वाली परंपराओं को ज़िंदा रखने में मदद की है।" पूजा की सभी रस्में बंगाली परंपराओं और पंचांग के अनुसार निभाई जाती हैं। श्री मित्रा ने बताया कि 'हॉलैंड-ए-होइचोई' ग्रुप के सदस्य दुर्गा पूजा को पूरे जोश और उत्साह के साथ मनाते हैं। वे घर की तरह ही कोलाबौ स्नान, सिंदूर खेला और संध्या आरती जैसी सभी रस्में निभाते हैं।

इस मशहूर पूजा के दस साल पूरे होने पर पंडाल को 'डाउन द मेमोरी लेन' थीम पर सजाया जा रहा है। श्री मित्रा ने कहा, "इस जश्न के दस साल पूरे होने पर मूर्ति तक जाने वाले रास्ते को पिछले दस सालों की दुर्गा पूजा की यादगार तस्वीरों से सजाया जाएगा। इससे 'होइचोई' परिवार के दस साल के सफ़र की एक जीवंत झलक देखने को मिलेगी।"चूंकि बंगाली लोग खाने-पीने के शौकीन होते हैं, इसलिए उनके लिए खास खाने-पीने का इंतज़ाम किया जा रहा है। इस साल की दावत में बंगाल के पांच अलग-अलग दौर के स्वाद शामिल होंगे-पाल-सेन काल में राजा लक्ष्मण सेन के दरबार की शाही इलिश मछली, बंगाल सल्तनत के दौर की गौलेश्वर की कोशा मांगशो, नवाबी बंगाल के दौर की नवाब बाड़ी की बागदा चिंगरी, औपनिवेशिक बंगाल के दौर की शोभावजार राजबाड़ी की भोगर खिचड़ी और आधुनिक बंगाल की नुमाइंदगी करने वाली कॉलेज स्ट्रीट केबिन की फिश फ्राई।

श्री मित्रा ने बताया कि इसके साथ ही खाने-पीने की चीज़ों, कपड़ों और गहनों के अलावा 'शरदिया पूजा-वार्षिकी' पत्रिका और बंगाली किताबें बेचने वाले खास स्टॉल भी लगाए जाएंगे, जो वहां रहने वाले बंगालियों की महफिल में जान डाल देंगे। श्री मित्रा के मुताबिक हालांकि विदेश में सभी रस्मों के साथ इतनी बड़ी पूजा का आयोजन करना कोई आसान काम नहीं है। जहां एक मूर्ति की पूजा लंबे समय तक की जाती है, वहीं पिछले साल नीदरलैंड में पहली बार कोलकाता के मशहूर कलाकार प्रदीप रुद्र पाल की बनाई 'पंचचला दुर्गा' मूर्ति कुमारतुली से एमस्टेलवीन लाई गई थी।

दूर देश में रहने के कारण पूजा का इंतज़ाम करना सदस्यों के लिए हर तरह की ज़िम्मेदारी वाला काम बन जाता है। जो बंगाली एमस्टेलवीन से साल के दौरान कोलकाता जाते हैं, उन्हें ज़रूरी चीज़ों की एक सूची दी जाती है ताकि वे उन्हें साथ ला सकें। पूजा के मंत्रों का उच्चारण और रस्में नीदरलैंड में रहने वाले दो इंजीनियर निभाते हैं, जबकि... इस संगठन की बंगाली महिलाएं कम्युनिटी के सदस्यों के लिए भोग तैयार करती हैं।

अपने घर पर रहने वाले परिवारों के उलट, जो पंचांग के अनुसार त्योहार मनाते हैं, एमस्टेलवीन में रहने वाले बंगाली लोग 16 से 20 अक्टूबर तक पांच दिनों तक पूजा मनाएंगे। विदेश में इतनी लंबी छुट्टियां मिलना मुश्किल हो सकता है। यह पक्का करने के लिए कि काम की वजह से त्योहार का मज़ा खराब न हो, कम्युनिटी के सदस्य बारी-बारी से काम से छुट्टी लेते हैं।

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