नयी दिल्ली , मार्च 24 -- विपक्षी दलों ने "उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026" को व्यक्ति की पहचान को नियंत्रित करने और निजता के अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए कहा है कि विधेयक में पहचान को जटिल बनाने का काम किया जा रहा है इसलिए सरकार को इसे वापस लेना चाहिए या संसद की स्थायी समिति को भेजना चाहिए।

कांग्रेस की एस ज्योतिमणी ने उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण( संशोधन विधेयक 2026 पर चर्चा की शुरुआत करते हुए विधेयक का विरोध किया और कहा कि विधेयक के जरिए सरकार उभयलिंगी समाज को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है। विधेयक के प्रावधान कठोर है और इस विधेयक के ज़रिए उभयलिंगी समाज की पहचान डॉक्टरों के पैनल और नौकरशाही के हवाले कर निजता की पहचान को नौकरशाही के हवाले करने का काम किया जा रहा है और इस समाज उनके लिए समानता की बात बदल जाएगी। उनका कहना था कि सरकार इस विधेयक के जरिए इस समुदाय के अधिकारों को नियंत्रित करने का काम कर रही है।

उन्होंने कहा कि विधेयक में बहुत सारी कमियां है। इसमें उभयलिंगी समाज के खिलाफ कदम उठाए जा रहे हैं इसलिए इस विधेयक को वापस लेकर संसद की स्थायी समिति को सौंपना चाहिए।

समाजवादी पार्टी के आनंद भदौरिया ने कहा कि उभयलिंगी समाज परंपरा से सम्मान का पात्र रहा है। इस संबंध में उन्होंने राम वनवास का संदर्भ दिया और कहा कि उभयलिंगी समाज के लोग भगवान राम से आशीर्वाद प्राप्त है। उनका कहना था कि महाभारत काल में भी उभयलिंगी समाज ने अपनी महत्ता का प्रदर्शन किया लेकिन मोदी सरकार इस विधेयक के माध्यम से इस समाज को आपराधिक श्रेणी में लाने का काम कर उनके अधिकारों के खिलाफ काम कर रही है।

उन्होंने कहा कि विधेयक में उभयलिंगी की पहचान के लिए मेडिकल टीम बनाने की बात है जो ट्रांसजेंडर का निर्धारण करेगी और फिर जिला अधिकारी प्रमाणित करेंगे कि व्यक्ति उभयलिंगी है या नहीं, विधेयक उभयलिंगी समाज के खिलाफ है और उनके अधिकारों को सीमित करता है। प्रस्तावित विधेयक उभयलिंगी की गरिमा और आजादी को भंग करता है और उन्हें नौकरशाही के अधीन पहचान के लिए सीमित अधिकारों में बांध देता है।

श्री भदौरिया ने इस विधेयक को अव्यवहारिक बताया और कहा कि सरकार 2019 में इस बारे में विधायक लाई थी लेकिन अब उसमें इतना जल्दी संशोधन भी ला रही है जो गलत है और इस समाज में असुरक्षा पैदा करता है। उनका कहना था कि यह विधेयक व्यक्ति की पहचान के खिलाफ है और इसमें इस समुदाय के लोगों का संरक्षण नहीं बल्कि उन्हें सरकारी तंत्र की जटिल प्रक्रिया में फंसा कर रखता है। इससे इस समुदाय के जीवन में अनिश्चित आएगी। उन्होंने विधेयक वापस लेने की मांग की और कहा कि यदि वापस नहीं लिया जा सकता है तो इसे स्थाई समिति को भेजा जाना चाहिए।

द्रमुक की डॉ टी सुमति उर्फ धामी धमिजाची धंगापण्डियन ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि सरकार ने संशोधन विधेयक लाने से पहले किसी तरह का विचार विमर्श नहीं किया है। उनका कहना था कि यह विधेयक मानवता के खिलाफ है क्योंकि एक मानव आत्मा को मेडिकल बोर्ड के जरिए प्रमाणित नहीं कराया जा सकता है। उन्होंने कहा है कि तमिलनाडु सरकार ने इस समुदाय के लिए समावेशी कार्य किया है। राशन कार्ड बनाने या अन्य किसी तरह के पहचान पत्र बनाने में उनके अधिकारों को कम करने का काम हुआ है। समानता के अधिकार का हनन का काम हुआ है। उनका कहना था कि संविधान सबको बराबरी का अधिकार देता है लेकिन मोदी सरकार व्यक्तिगत पहचान को मेडिकल बोर्ड की पहचान पर डाल रही है और मेडिकल प्रमाण के आधार पर व्यक्ति के लिंग की पहचान का नियंत्रण मानव अधिकारों की मान सम्मान का उल्लंघन है।

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