नासिक , अक्टूबर 31 -- गोदावरी नदी के तट पर शनिवार को आस्था और सांस्कृतिक एकता के संगम के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 'नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेला 2027' के धार्मिक ध्वजारोहण समारोह और 'महा गोदा आरती' को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्रीय एकता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता का आह्वान करते हुए विश्वास जताया कि आगामी कुंभ प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं और आधुनिक विकास का एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करेगा।अपने संबोधन की शुरुआत मराठी भाषा में करते हुए राष्ट्रपति ने नासिक की पवित्र भूमि और गोदावरी नदी के आध्यात्मिक महत्व को नमन किया। उन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देने वाले वीरों और महात्मा ज्योतिराव फुले व डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जैसे महापुरुषों को याद करते हुए कहा कि उनके विचारों ने देश को सामाजिक समानता की नई दिशा दी।

राष्ट्रपति ने नासिक के आदिवासी बहुल इलाकों के 650 गांवों से आए लगभग 6,500 आदिवासियों की गोदा आरती में सहभागिता की सराहना की और इसे भारत की 'विविधता में एकता' का प्रतीक बताया।

पर्यावरण और जनहित से जुड़े मुद्दों पर श्रीमती मुर्मू ने कहा कि धार्मिक आस्था के साथ-साथ स्वच्छता, नदियों के संरक्षण और कचरा प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना अनिवार्य है। उन्होंने राज्य में सूखे की स्थिति से प्रभावित किसानों की गरिमा का ध्यान रखते हुए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से हर संभव सहायता का आश्वासन भी दिया।

कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति ने सिंहस्थ कुंभ मेले की आधिकारिक वेबसाइट और कुंभ गीत का विमोचन किया। इसके साथ ही उन्होंने रामतीर्थ (नासिक) और कुशावर्त तीर्थ (त्र्यंबकेश्वर) के धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व पर आधारित विशेष डाक टिकट भी जारी किए।

समारोह में राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने कुंभ को पर्यावरण के अनुकूल आयोजित करने की बात कही, जबकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुनियादी ढांचागत विकास के जरिए नासिक और त्र्यंबकेश्वर के कायाकल्प की प्रतिबद्धता जताई।

उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने जानकारी दी कि कुंभ मेले में आने वाले करीब 12 करोड़ श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए क्षेत्र में लगभग 35,000 करोड़ रुपये के विकास कार्य किए जा रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बनेंगे और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

इस भव्य आयोजन में उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार, कुंभ मेला मंत्री गिरीश महाजन, विभिन्न अखाड़ों के संत-महंत, स्थानीय जनप्रतिनिधि और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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