(जयंत रॉय चौधरी से)ठाकुरनगर (पश्चिम बंगाल) , अप्रैल 27 -- पश्चिम बंगाल में बुधवार को होने वाले अंतिम चरण के मतदान की तैयारी के बीच सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस और उसे चुनौती दे रहा विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों एक ही समुदाय पर सधा हुआ दांव लगा रहे हैं। दोनों ही दल इस समुदाय को इस 'करो या मरो' के खेल में निर्णायक मान रहे हैं। यह है बंगलादेश की सीमा से सटे गांवों में बसा लगभग 30 लाख की आबादी वाला मतुआ समुदाय।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां रविवार को उत्तर 24 परगना जिले के ठाकुरनगर का दौरा किया और ठाकुरबाड़ी में मतुआ समुदाय के मुख्य मंदिर में पूजा-अर्चना की, वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले साल नवंबर की शुरुआत में ही मतुआ मतदाताओं को लुभाना शुरू कर दिया था, जब उन्होंने बनगांव से ठाकुरनगर तक तीन किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा का नेतृत्व किया था।

तृणमूल कार्यकर्ता तब से उन इलाकों में फैल गये हैं, जो अब तक भाजपा के गढ़ माने जाते थे, जिससे दक्षिणपंथी पार्टी के कार्यकर्ताओं की चिंता बढ़ गयी है। 1965 में पूर्वी पाकिस्तान के फरीदपुर जिले से भारत आये 69 वर्षीय दिलीप बिस्वास ने कहा, "मतुआ समुदाय यह तय कर सकता है कि दक्षिण बंगाल के बड़े हिस्सों में वोट किस तरफ जायेगा।"2019 के आम चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा की बड़ी सफलता और उसके बाद 2024 के प्रदर्शन में इसे बढ़ाते हुए 39 प्रतिशत वोट के साथ लगभग 90 विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल की, उसमें इस हाशिये पर रहने वाले समुदाय के समर्थन का बड़ा हाथ था। यह समुदाय 50 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों या पश्चिम बंगाल विधानसभा के लगभग पांचवें हिस्से के परिणामों को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है।

मतुआ समुदाय के गांवों और उपनगरीय कस्बों के समूह उत्तर 24 परगना और नदिया जिलों में फैले हुए हैं, जबकि दक्षिण 24 परगना और अन्य क्षेत्रों में भी उनकी कुछ आबादी है। अनुसूचित जाति समूह के 'नमशूद्र' समुदाय से उत्पन्न यह समूह, 19वीं सदी के सुधारक हरिचंद ठाकुर की शिक्षाओं पर आधारित एक सुधारवादी वैष्णव परंपरा का पालन करता है।

इस संप्रदाय का मूल केंद्र ओराकांडी (जो अब बंगलादेश में है) है, लेकिन इसका भारतीय आध्यात्मिक केंद्र ठाकुरनगर बन गया है। कोलकाता से लगभग 70 किलोमीटर दूर और अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब बसा यह कस्बा चारों ओर हरियाली से घिरा हुआ है।

मूल रूप से बांग्लादेश के जेसोर जिले का हिस्सा रहे बनगांव और गायघाटा, जहां मतुआ संप्रदाय की सबसे बड़ी आबादी है, रेडक्लिफ लाइन के कारण भारत के हिस्से में आ गये। इसी वजह से इन दोनों क्षेत्रों के बीच ठाकुरनगर की स्थापना हुई।

बंगाल के राजनीतिक समीकरण को सुलझाने के लिए मतुआ समुदाय के महत्व को समझते हुए प्रधानमंत्री मोदी मार्च 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बंगलादेश की अपनी राजकीय यात्रा के दौरान ओराकांडी जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे।

इस बार भाजपा के लिए समस्या मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) है, जिसने पूरे राज्य में लगभग 91 लाख मतदाताओं को प्रभावित किया है। इसने मतुआ समुदाय को भी प्रभावित किया है और इसे लेकर उनमें बेचैनी बढ़ रही है। केंद्र सरकार में राज्य मंत्री शांतनु ठाकुर लोगों की भावनाओं को शांत करने में जुटे हैं। उन्होंने वादा किया है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) 2019 का उपयोग उन मतुआ लोगों को पूर्ण नागरिकता प्रदान करने के लिए किया जायेगा, जिन्हें इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

बनगांव और गायघाटा में निवासियों को नागरिकता के लिए आवेदन करने की प्रक्रिया में मार्गदर्शन देने के लिए अस्थायी कैंप लगाये गये हैं, जो जमीनी स्तर पर एक शांत लेकिन दृढ़ लामबंदी को दर्शाते हैं।

मतुआ समुदाय के आध्यात्मिक केंद्र ठाकुरनगर में, अखिल भारतीय मतुआ महासंघ के शांतनु ठाकुर के घर पर ऐसा ही एक 'हेल्प डेस्क' स्थापित किया गया है।

ज्यादातर मतुआ सीएए प्रक्रिया से गुजरने में डर रहे हैं, भले ही वे मार्च 1971 के बाद भारत आये हों, जो पूर्वी पाकिस्तान से भारत आने वाले शरणार्थियों के लिए स्वतः ही भारतीय नागरिक माने जाने की कट-ऑफ तारीख है।

69 वर्षीय बिस्वास ने सवाल किया, "सीएए आवेदन के लिए जरूरी दस्तावेज जुटाना मुश्किल है। कई लोग पूछ रहे हैं कि जब ज्यादातर मतुआ लोगों के पास पहले से ही वोटर आईडी और आधार कार्ड जैसे दस्तावेज मौजूद हैं, तो उन्हें इस प्रक्रिया में क्यों पड़ना चाहिए? साथ ही, क्या इससे उनके पास पहले से मौजूद सभी दस्तावेज़ कानूनी रूप से चुनौती देने योग्य बन जायेंगे?"मार्च 2024 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के नियम अधिसूचित होने के बाद से पूरे पश्चिम बंगाल में लगभग 1,12,000 आवेदन जमा किये गये हैं, लेकिन अब तक केवल लगभग 15,000 आवेदकों को ही नागरिकता दी गयी है।

सीएए ने उन हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का वादा किया है, जिन्हें धार्मिक उत्पीड़न के कारण पड़ोसी दक्षिण एशियाई देशों से भारत आना पड़ा था, जिसके लिए 2014 की समय-सीमा तय की गयी है।

श्री बिस्वास ने इस बात की ओर इशारा किया कि असम में विदेशी होने के संदेह में जिन्हें मताधिकार से वंचित किया गया या डिटेंशन कैंपों में डाला गया, उनमें भारी संख्या में हिंदू बंगाली थे। इनमें से कई उसी नमशूद्र जाति से थे, जिससे अधिकतर मतुआ समुदाय ताल्लुक रखता है।

मतुआ समुदाय स्वयं सीएए या एसआईआर से पहले ही बंटा हुआ था। एक गुट श्री शांतनु ठाकुर और भाजपा के साथ है, जबकि दूसरा गुट तृणमूल कांग्रेस की श्रीमती ममता बाला ठाकुर का अनुसरण करता है।

उनकी प्रतिद्वंद्विता दिवंगत मातृसत्तात्मक हस्ती 'बीणापाणि देवी' (जिन्हें 'बड़ो मां' के नाम से जाना जाता है) की विरासत पर व्यापक संघर्ष को दर्शाती है, जिनके प्रभाव ने कभी इस समुदाय को एकजुट किया था। श्री शांतनु ठाकुर उनके पोते हैं, जबकि श्रीमती ममता बाला ठाकुर उनकी बहू हैं।

प्रख्यात राजनीतिक वैज्ञानिक और रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर सब्यसाची बसु रॉय चौधरी ने कहा, "पश्चिम बंगाल काफी हद तक उस तरह की खुली जाति-आधारित राजनीति से बचा रहा है, जो उत्तर भारत के अधिकतर हिस्सों में देखी जाती है, लेकिन हाल के दशकों में मतुआ समुदाय एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा है।"आजादी के बाद से उम्मीदवारों के चयन को छोड़कर पश्चिम बंगाल में जाति-आधारित राजनीति की भूमिका कम ही रही है। यह आंशिक रूप से बंगाल के 19वीं सदी के पुनर्जागरण का परिणाम था और आंशिक रूप से इसलिए, क्योंकि औद्योगिकीकरण और विभाजन ने लोगों को जाति-आधारित गांवों के बजाय एक साथ मिलकर रहने पर मजबूर कर जाति की बाधाओं को तोड़ने में मदद की।

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