जयपुर , सितम्बर 25 -- राजस्थान में राजस्थान उच्च न्यायालय ने नर्सिंग महाविद्यालयों का अनापत्ति प्रमाण (एनओसी) जारी करने में राज्य सरकार की ओर से हुई देरी को गंभीरता से लेते हुए लंबित प्रत्येक आवेदनकर्ता महाविद्यालय को 10 लाख रुपये देने का आदेश दिया है।

अदालत ने यह आदेश गुरुवार को दिये। इससे राज्य सरकार पर करीब 60 करोड़ रुपये की वित्तीय देनदारी आने की बात सामने आई है।

मामला बीएससी नर्सिंग और जीएनएम पाठ्यक्रम संचालित करने के लिए निजी संस्थानों की ओर से एनओसी के लिए किए गए आवेदनों से जुड़ा है। अदालत के समक्ष बताया गया कि राज्य सरकार की ओर से जारी दिशा-निर्देशों के तहत आवश्यक आधारभूत सुविधाएं विकसित करने के बाद संस्थानों ने एनओसी के लिए आवेदन किए थे, लेकिन बड़ी संख्या में आवेदन लंबे समय से लंबित रहे।

अदालत ने पूर्व में भी राज्य सरकार को एनओसी आवेदनों पर समयबद्ध निर्णय लेने के निर्देश दिए थे। इसी वर्ष फरवरी के आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा था कि आगामी शैक्षणिक सत्र में एनओसी के लिए प्राप्त आवेदन मार्गदर्शन के प्रथम चरण से कम से कम 45 दिन पहले तय किए जाने चाहिए। निर्धारित समयसीमा में निर्णय नहीं होने पर प्रभावित संस्थानों को देरी के अनुपात में लागत के रूप में मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।

बाद की सुनवाई में अदालत ने पाया कि कई आवेदन डेढ़ वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं। अदालत ने कहा कि बार-बार अवसर दिए जाने और राज्य सरकार की ओर से आश्वासन दिए जाने के बावजूद एनओसी पर अंतिम निर्णय नहीं किया गया।

अदालत ने यह भी माना कि एनओसी आवेदनों पर निर्णय किए बिना मार्गदर्शन प्रक्रिया आगे बढ़ाने से उन संस्थानों को नुकसान होगा, जिनके आवेदन सरकारी स्तर पर लंबित रहने के कारण अटके हुए हैं।

इस मामले में राज्य सरकार की ओर से एनओसी संबंधी निर्णय के लिए उच्च स्तर पर विचार किए जाने की बात भी अदालत के समक्ष रखी गई थी। सितंबर 2026 में भी कुछ लंबित मामलों में राज्य सरकार ने निर्णय के लिए अतिरिक्त समय मांगा था।

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