चेन्नई , अगस्त 07 -- तमिलनाडु में चेन्नई की जॉर्ज टाउन महानगर मजिस्ट्रेट अदालत ने शुक्रवार को वरिष्ठ द्रमुक नेता और पूर्व मंत्री के. पोनमुडी के अदालत में पेश होने के बाद उनके खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट वापस ले लिया। यह मामला शैव और वैष्णव संप्रदायों तथा महिलाओं पर कथित आपत्तिजनक और नफरत भाषण से जुड़ा है, जिन पर धार्मिक भावनाएं आहत करने और वैमनस्य फैलाने का आरोप है।

सुनवाई के दौरान अदालत में पेश न होने पर जारी किये गये गैर-जमानती वारंट के एक दिन बाद विल्लुपुरम जिले में द्रमुक के कद्दावर नेता पोनमुडी अपने अधिवक्ताओं के साथ अदालत के समक्ष पेश हुए।

श्री पोनमुडी की पेशी के बाद उनके अधिवक्ता ने अपने मुवक्किल के खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट को वापस लेने की याचिका दायर की।

जॉर्ज टाउन अदालत के तीसरे जीटी मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट सी सुंदरपांडियन ने पूर्व द्रमुक मंत्री की उपस्थिति दर्ज करने और याचिका को स्वीकार करने के बाद उनके खिलाफ जारी वारंट वापस ले लिया तथा मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 अगस्त को मुकर्रर की गयी।

अप्रैल 2025 में तमिलनाडु के तत्कालीन मंत्री पोनमुडी ने चेन्नई में शैवों, वैष्णवों और महिलाओं को निशाना बनाते हुए विवादास्पद भाषण दिया था। एक आंतरिक बैठक में की गयी इन टिप्पणियों से भारी जन आक्रोश फैल गया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें द्रमुक पार्टी के पद से हटा दिया गया और अंततः राज्य मंत्रिमंडल से भी बाहर कर दिया गया।

इस घटना के बाद चेन्नई निगम में भाजपा पार्षद उमा आनंदन ने निजी शिकायत दर्ज करायी थी, जिसमें धार्मिक शत्रुता को बढ़ावा देने और धार्मिक मान्यताओं को ठेस पहुंचाने के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की गयी थी। जॉर्ज टाउन अदालत ने शिकायत का संज्ञान लेकर कार्रवाई शुरू की थी।

अप्रैल 2025 में घटना के तुरंत बाद मद्रास उच्च न्यायालय ने भी उनके खिलाफ़ स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्यवाही शुरू की थी। 16 सितंबर 2025 को उच्च न्यायालय ने इस आधार पर स्वतः संज्ञान वाली रिट याचिका बंद कर दी थी कि पुलिस को उनके खिलाफ 100 से अधिक शिकायतें मिली थीं लेकिन प्रथम दृष्टया मामला न पाये जाने के बाद पुलिस ने उन सभी शिकायतों को बंद कर दिया था।

स्वतः संज्ञान वाली याचिका को बंद करते हुए न्यायमूर्ति एन सतीश कुमार ने शिकायतकर्ताओं को पुलिस की सौंपी क्लोजर रिपोर्ट को संबंधित क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेटों के समक्ष चुनौती देने की छूट दी थी। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि पूर्व मंत्री को इस तरह के भाषण नहीं देने चाहिए थे, भले ही उन्होंने दावा किया हो कि उन्होंने केवल वही दोहराया था, जो 1970 के दशक में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कहा गया था। न्यायाधीश ने कहा कि उच्च पदों पर बैठे लोगों को ऐसे भाषण देना शोभा नहीं देता।

अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान श्री पोनमुडी खुद पेश नहीं हो रहे थे और लगातार व्यक्तिगत पेशी से छूट की अर्जियां लगा रहे थे।

इस बीच पूर्व मंत्री ने उनके खिलाफ दर्ज निजी शिकायतों और नफरत भरे भाषण के आरोपों को रद्द करने की मांग को लेकर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने दो जुलाई को उनकी याचिका खारिज कर दी और मामले की सुनवाई जारी रखने की अनुमति दे दी।

गुरुवार को जब मामले पर सुनवाई हुई, तो श्री पोनमुडी की ओर से व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट मांगने वाली याचिका दायर की गयी। न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए गैर-जमानती वारंट जारी किया और पुलिस को उन्हें गिरफ्तार कर दो सितंबर या उससे पहले अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया। इसके बाद अदालत ने मामले की अगली सुनवाई उसी तारीख तक के लिए स्थगित कर दी थी।

श्री पोनमुडी आज अदालत के समक्ष पेश हो गए, इसलिए उनके खिलाफ जारी गैर-जमानती वारंट वापस ले लिया गया।

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