रायपुर , जुलाई 29 -- छत्तीसगढ में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस वर्ष आयोजित किए जा रहे 'हर घर तिरंगा' अभियान में नक्सल प्रभाव से मुक्त हुए गांवों को विशेष प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। पार्टी ऐसे गांवों की सूची तैयार करा रही है, जहां पिछले करीब तीन दशकों से राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया गया। इन गांवों में विशेष तिरंगा यात्राएं आयोजित की जाएंगी, जिनमें आत्मसमर्पित नक्सलियों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी।

पार्टी के निर्देशों के अनुसार 11 से 15 अगस्त तक चलने वाले अभियान के दौरान ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले जवानों, पुलिसकर्मियों तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के उनके परिवारों का सम्मान किया जाएगा। इन परिवारों को तिरंगा भेंट करने का भी कार्यक्रम रखा गया है।

अभियान के तहत मंडल एवं जिला स्तर पर भव्य तिरंगा यात्राएं निकाली जाएंगी। प्रत्येक मंडल मुख्यालय के अलावा मंडल के पांच प्रमुख गांवों अथवा बाजारों में भी तिरंगा यात्रा आयोजित करने के निर्देश दिए गए हैं। अभियान में भाजपा युवा मोर्चा की प्रमुख भूमिका रहेगी। साथ ही स्कूल-कॉलेजों के विद्यार्थियों, सामाजिक एवं महिला संगठनों, सेवानिवृत्त सैनिकों तथा सुरक्षा कर्मियों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है।

कार्यक्रम के तहत जिला मुख्यालयों में भाजपा युवा मोर्चा 100 युवतियों की भागीदारी के साथ मोटरसाइकिल तिरंगा रैली निकालेगा। सीमावर्ती क्षेत्रों में वरिष्ठ नेता सीमा चौकियों पर तैनात जवानों का सम्मान करेंगे, जबकि शहीद पुलिसकर्मियों के घर पहुंचकर उनके परिजनों को सम्मानित किया जाएगा। अभियान के दौरान केवल कपड़े के राष्ट्रीय ध्वज का उपयोग किए जाने के निर्देश भी दिए गए हैं।

भाजपा 14 अगस्त को 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' भी मनाएगी। इस अवसर पर जिलों में बैनर और प्लेकार्ड के साथ मौन जुलूस निकाला जाएगा। इसके अलावा विभाजन का दंश झेलने वाले परिवारों से पार्टी पदाधिकारी व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर उनकी स्मृतियों को साझा करेंगे।

पार्टी का मानना है कि बस्तर सहित छत्तीसगढ़ के सुदूर नक्सल प्रभावित इलाकों में तिरंगा फहराना केवल राष्ट्रीय पर्व का आयोजन नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों की बढ़ती पहुंच और सरकारी तंत्र की प्रभावी वापसी का प्रतीक भी है। बीते तीन से चार दशकों के दौरान नक्सली बहिष्कार के कारण अनेक अंदरूनी गांवों में राष्ट्रीय ध्वज के स्थान पर काले अथवा लाल झंडे लगाए जाते थे।

हाल के वर्षों में नए सुरक्षा शिविरों की स्थापना, सड़क संपर्क के विस्तार तथा "नियद नैलनार" जैसी विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के बाद इन क्षेत्रों में परिस्थितियां बदली हैं। ऐसे में नक्सलमुक्त गांवों में तिरंगा यात्रा आयोजित करना तथा आत्मसमर्पित नक्सलियों की भागीदारी सुनिश्चित करना मुख्यधारा में उनकी वापसी और मनोवैज्ञानिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

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