नयी दिल्ली , अप्रैल 06 -- वैज्ञानिकों ने एक नई खोज की है, जिससे यह पता लगाना आसान हो जाएगा कि भारत के सबसे उपजाऊ इलाके 'गंगा के मैदानी क्षेत्रों' में खेती की शुरुआत कब और कैसे हुई थी।
बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के वैज्ञानिकों ने पहली बार भारतीय मिट्टी और पौधों के नमूनों का इस्तेमाल कर एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे असली फसलों और जंगली घास के बीच का अंतर साफ पता चल जाता है। अब तक भारतीय वैज्ञानिक इस काम के लिए यूरोप के आंकड़ों (डेटा) पर निर्भर थे, जो हमेशा सटीक नहीं होते थे।
वैज्ञानिकों ने 'पराग कणों' (पोलन) का अध्ययन किया। दरअसल, गेहूं, धान, जौ और बाजरा जैसी फसलें भी घास के परिवार का हिस्सा हैं। सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) से देखने पर इनके और जंगली घास के पराग कण बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं, इसलिए इनके बीच अंतर करना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है।
चूंकि पराग तलछट (सेडिमेंट्स) में सुरक्षित रहते हैं, इसलिए उनका विश्लेषण पिछले 11,700 वर्षों (होलोसीन युग) के दौरान कृषि, वनों की कटाई और मानव बस्तियों का खुलासा कर सकता है।
बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन के लिए 22 अनाज और गैर-अनाज प्रजातियों का विश्लेषण किया। उन्होंने अध्ययन के दौरान पाया कि अनाज के पराग कणों का व्यास आमतौर पर 46 माइक्रोन होता है और पराग कण पर स्थित छल्ले (एनुलस) का आकार नौ माइक्रोन से अधिक होता है (बाजरा को छोड़कर, जो छोटा होता है), जबकि जंगली घास के कणों का आकार इससे कम होता है।
इस बारीक अंतर की पहचान होने से अब यह सटीक रूप से बताया जा सकेगा कि किसी खास इलाके में इंसान कब बसे और उन्होंने किस समय से वहां खेती करना शुरू किया।
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