रायपुर , अप्रैल 07 -- छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026 को राजभवन से मंजूरी मिलने के बाद कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नया कानून किसी के मौलिक अधिकारों के हनन का कारण न बने और इसका दुरुपयोग न हो।
उन्होंने राज्यपाल से यह भी मांग की कि छत्तीसगढ़ आरक्षण संशोधन विधेयक, जो तीन वर्ष से अधिक समय से लंबित है, उस पर भी शीघ्र निर्णय लिया जाए, क्योंकि इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के अधिकार निहित हैं।
श्री बैज ने प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सरकार बढ़ते अपराधों को छिपाने के लिए थानों में एफआईआर दर्ज नहीं होने दे रही है।
उन्होंने कहा कि चोरी, जालसाजी, मारपीट, प्रताड़ना और साइबर ठगी जैसे मामलों में पीड़ितों को रिपोर्ट दर्ज कराने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज नहीं करने से अपराधों के आंकड़े भले कम दिखें, लेकिन वास्तविकता में अपराध बढ़ रहे हैं और इससे अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कानून के अनुसार एफआईआर दर्ज करना पुलिस की बाध्यता है और जिन मामलों में एफआईआर नहीं हो सकती, वहां परिवाद दायर करने की लिखित सलाह दी जानी चाहिए, लेकिन प्रदेश में फरियादियों को थानों से वापस लौटाया जा रहा है।
श्री बैज ने सीजीपीएससी परीक्षा को लेकर भी सरकार और राज्य लोकसेवा आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि परीक्षा की समय-सारणी अव्यवस्थित है और अभ्यर्थियों को पर्याप्त तैयारी का समय नहीं दिया जा रहा। इस वर्ष प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम 25 मार्च 2026 को जारी हुआ, जबकि मुख्य परीक्षा 16 से 19 मई 2026 के बीच प्रस्तावित है, जिससे अभ्यर्थियों को केवल 51 दिन का समय मिल रहा है। पिछले वर्ष यही अंतराल 104 दिन का था।
उन्होंने कहा कि इतनी कम अवधि में अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा की तैयारी कैसे कर पाएंगे और सरकार इस पर स्पष्टीकरण दे।
शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत बच्चों के प्रवेश को लेकर भी कांग्रेस ने चिंता जताई। श्री बैज ने कहा कि फीस भुगतान और दरों में वृद्धि नहीं होने के कारण निजी स्कूल आरटीई के तहत प्रवेश देने से इंकार कर रहे हैं, जिससे गरीब परिवारों के बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है। उन्होंने सरकार से तत्काल निजी स्कूल प्रबंधन से बातचीत कर गतिरोध समाप्त करने की मांग की, ताकि बच्चों का प्रवेश सुनिश्चित हो सके।
उन्होंने दुर्ग जिले के समोदा में अवैध अफीम की खेती के मामले को उठाते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जिस कृषि विस्तार अधिकारी को मक्का की आड़ में अफीम की खेती बताने के आरोप में निलंबित किया गया था, उसे जांच रिपोर्ट आने से पहले ही बहाल कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की कार्रवाई से जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं तथा प्रदेश में अवैध नशे की खेती को संरक्षण मिलने का संदेश जाता है।
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