जालंधर , अप्रैल 2 -- एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि देश मे लगभग हर 100 में से एक बच्चा ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से प्रभावित होता है और लड़कों में ऑटिज्म होने की संभावना लड़कियों की तुलना में चार गुना अधिक होती है।

फरीदकोट स्थित बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज, स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ नरेश पुरोहित ने विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर गुरूवार को बताया कि यह एक मानसिक विकास संबंधी डिसऑर्डर है। इससे बच्चे को बातचीत करने में, पढ़ने-लिखने में और समाज में मेलजोल बनाने में परेशानियां आती हैं। प्रशिक्षण, मरीज और परिजनों की काउंसलिंग करके दिमाग की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। इस डिसॉर्डर का कोई निश्चित कारण नहीं है, लेकिन यह आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारणों से जुड़ा हो सकता है। यदि शुरुआती अवस्था में पहचान हो जाए, तो उचित थेरेपी से बच्चों की सामाजिक और संचार क्षमता में सुधार किया जा सकता है।

एक्शन फॉर ऑटिज्म के कार्यकारी सदस्य डॉ पुरोहित ने यूनीवार्ता को बताया कि ऑटिज्म एक ऐसी स्थिति है, जिससे बच्चे का दिमाग अन्य लोगों के दिमाग की तुलना में अलग तरीके से काम करता है। ऑटिज्म में अलग-अलग बच्चों को अलग-अलग लक्षण दिखाई देते हैं। उन्होने कहा कि तीन या चार साल की उम्र होने पर भी नहीं बोलना सबसे बड़ा लक्षण है। कई बार बोलना सिखाने के बाद भी बच्चा एक या दो शब्दों से ज्यादा नहीं सीख पाता। बच्चा कई बार माता पिता की बातें तो समझ लेता है, लेकिन जवाब नहीं दे पाता।

दूसरा लक्षण यह है कि आमतौर पर जब बच्चों से बात की जाती है, तो वे आपकी तरफ देखते हैं, लेकिन ऑटिज्म में बच्चा नजर मिलाने से बचता है। अगर आप बार-बार उसका नाम भी लेते हैं या फिर उसकी तरफ देखकर भी कुछ कहते हैं, तो वह आपकी तरफ नहीं देखता। वह ज्यादातर नजरें मिलाने से बचता है। यहां-वहां देखता रहता है। ऑटिज्म में बच्चा बोलता नहीं है, लेकिन वह बार-बार एक ही शब्द या मुंह में बड़बड़ाता रहता है। कई बार तो उसकी बातें समझ भी नहीं आती। बच्चा कई बार चिल्लाता है या फिर पूरे दिन एक ही शब्द या बात बोलता रहता है।

अन्य लक्षण है - दांत पीसते रहना, रात में नींद न आना । आमतौर पर बच्चे दिन में खेलकर देर रात 10 बजे तक सो जाते हैं लेकिन ऑटिज्म में बच्चा पूरे दिन उछल-कूद करके भी ज्यादा नहीं थकता। रात में नींद आने पर भी जल्दी नहीं सोता। ऐसे बच्चों का स्लीपिंग पैटर्न बहुत अलग होता है। कई बार तो बच्चा सुबह तक जगा रह जाता है।

डॉ पुरोहित ने अपनी ताजा शोध अध्ययन रिपोर्ट के हवाले से कहा कि ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चे मंदबुद्धि वाले नहीं होते। उनके दिमाग के न्यूरॉन्स के बीच वायरिंग में गड़बड़ी होती है, जो उनकी सोचने और बोलने की क्षमता को प्रभावित करती है। उन्होने आगे जानकारी दी कि कई बच्चों में यह मस्तिष्क संबंधी गंभीर विकार जन्म के तुरंत बाद बर्थ एस्फिक्सिया के कारण होता है। इस प्रकार के मामले उन बच्चों में अधिक सामने आते हैं, जिन गर्भवती मरीजों को प्रसव के दौरान जटिलताएं होती हैं। इसलिए जरुरी है, कि गर्भावस्था के दौरान से ही समय पर जांच, कुशल डॉक्टर की सलाह लेने के साथ ही संस्थागत प्रसव ही कराएं।

प्रसिद्ध तंत्रिका विज्ञान शोधार्थी ने स्पष्ट कहा कि कई लोगों को लगता है कि इसका इलाज बेहद ही मुश्किल है, पर ऐसा नहीं है। ऑटिज़्म से जूझ रहे बच्चों में से 80 प्रतिशत उचित खान-पान और कसरत से ठीक हो सकते हैं। विशेषज्ञो के अनुसार यदि ऑटिज़्म का सही समय पर निदान हो और डाइट-कसरत को सही तरीके से अपनाया जाए तो इस तरह के बच्चों में यह काफी प्रभावशाली साबित हो सकता है। ऑटिज़्म के शेष 20 प्रतिशत मामलों में दवाओं की ज़रूरत पड़ती है , हालांकि दवाओं की मदद से इस समस्या का समाधान संभव है।

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